शनिवार, 6 मई 2017

👉 युग परिवर्तन का वासन्ती प्रवाह

🔵 वसन्त में परिवर्तन के प्रवाह की मर्मर ध्वनि सुनायी देती है। एक गहन-गम्भीर अन्तर्नाद गूँजता है। इसकी छुअन भर से समूची प्रकृति अपने सड़े-गले, जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को उतारकर,वासन्ती परिधान पहनकर सजने-सँवरने लगती है। परिवर्तन का यह वासन्ती प्रवाह पतझड़ को रंग-विरंगी कोपलों एवं सुरभित-सुगन्धित फलों में बदल देता है। कँपकपा देने वाली बर्फीली-सर्दीली हवाएँ वसन्ती ब्यार का रूप ले लेती हैं। अब तो प्राकृतिक परिवर्तन के इसी पर्व को दैवीचेतना ने युगपरिवर्तन के महापर्व का गौरव दिया है।

🔴 युगपरिवर्तन के वासन्ती प्रवाह का रहस्यमय उद्गम तब हुआ, जब परमपूज्य गुरुदेव को उनके महान् गुरु ने भगीरथी तपश्चर्या का उद्बोधन, आह्वान प्रस्तुत किया और उस निर्देश को शिरोधार्य करने के लिए गुरुदेव तत्क्षण उद्यत हो गए। वे एकनिष्ठ भाव से समग्र श्रद्धा नियोजित करके युग परिवर्तन के प्रवाह को जगती पर लाने के लिए उसी प्रकार तत्पर रहे, जिस प्रकार गंगाप्रवाह के अवतरण का लक्ष्य लेकर भगीरथ ने कठोर तप-साधना की अग्नि परीक्षा में प्रवेश किया था। निश्चित रूप से यह प्रयास सोने को अग्नि में तपाकर निर्मल एवं तेजस्वी बनाने जैसा था। जिसके आधार पर उन्हें महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, विभूतियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त हो सकीं। अपनी इसी तप-साधना के बल पर उन्होंने युगपरिवर्तन की प्रचण्ड धाराओं को दु्रतगति से प्रवाहित कर सकने में अलौकिक सफलता प्राप्त की।
  
🔵 युगपरिवर्तन का यह वासन्ती प्रवाह न केवल प्रकृति एवं पर्यावरण, बल्कि मानवीय जीवन के हर पहलू को आमूल-चूल बदल डालने के लिए उतारू है। यही कारण है कि इन्सानी जिन्दगी के हर छोर पर दरकन और दरारें पड़ चुकी हैं। सब तरफ पुरानेपन के ध्वंस और महानाश की चीत्कारों और हाहाकार की आर्त गूँज है। पर इसी के साथ नवसृजन की कोमल किलकारियाँ हैं एवं नवचेतना के अंकुरण का मधुर संगीत भी है, ये स्वर अभी कितने ही मन्द क्यों न हों, किन्तु जिनके पास तनिक-सा भी अन्तर्ज्ञान है, वे इन्हें सहज ही सुन-समझ सकते हैं।

🔴 राजनैतिक एवं आर्थिक क्षेत्रों की संकटग्रस्त स्थिति की चर्चा सर्वत्र है, पर प्राकृतिक, सामाजिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विपदाएँ ही कहाँ कम हैं? सच तो यह है कि हर तरफ पुरानापन टूटकर नवसृजन हो रहा है। अकेला व्यक्ति या कोई एक परिवार अथवा फिर कोई एक देश या समाज नहीं, बल्कि पूरे का पूरा युग परिवर्तित हो रहा है। इस युगपरिवर्तन के अनेक पहलू हैं, अगणित आयाम हैं और साथ ही हैं, इसके विविध मोर्चों पर जुझारू संघर्ष के लिए समर्थ युगसैनिकों के लिए वीरोचित आह्वान। यह संदेश। आमंत्रण!! आह्वान!!! शब्दों की सतह पर नहीं, भावों की गहराइयों में ही सुना और समझा जा सकता है।

🔵 इसे धारण करने के लिए हम सावधान हो जाएँ। युग परिवर्तन का वासन्ती प्रवाह हम तक पहुँचे यह कामना करते हुए बैठे न रहें। वह तो सदा से समर्थ है और अपना काम करेगा ही। हम तो कामना करें इस प्रवाह की वासन्ती ज्वाला की, वासन्ती शौर्य के शोलों की, जिसके तेज से अनीति एवं अवांछनीयताएँ जलकर भस्म हो जाएँ। युग परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हो और नवयुग मुस्करा उठे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 58

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