शनिवार, 6 मई 2017

👉 सीमित से असीम जीवन की ओर

🔵 शंकराचार्य जी अपनी माता की इकलौती संतान थे। माता ने सतान प्राप्ति के लिये शिव की घोर तपस्या की। तपस्या के फलस्वरूप जो संतान मिली-उसका नाम शंकर रखा।

🔴 साधारण स्त्रियों की तरह वे भी यही स्वप्न देखा करतीं थी कि कुछ ही दिनों में जब हमारा शंकर और बड़ा हो जायेगा तो उसका ब्याह करुँगी। बहू घर में आयेगी। हमारा घर भी कुछ ही दिनों में नाती पोतों से भरा-पूरा हो जायेगा। बहू की सेवाओं से हमें भी तृप्ति मिलेगी। जीवन की अंतिम घडियाँ सुख-शांति और वैभवपूर्ण ढ़ंग से समाप्त होंगी। ज्यो-ज्यों शकर बडे होते जाते, माता का वह स्वप्न और भी तीव्र होता जाता।

🔵 जन्म-जात प्रतिभा-संपन्न शंकर का ध्यान जप, तप, पूजा-पाठ और दूसरे की सेवा, सहायता में ही अधिक लगता था। ज्ञानार्जन करना और इस प्रसाद को दूसरों तक वितरित करने की एक आकांक्षा हृदय के एक कोने से धीरे-धीरे प्रदीप्त हो रही थी। समाज की दयनीय दशा देखकर, उन्हे तरस आ रहा था। समाज को एक प्रखर, सच्चे और एकनिष्ठ सेवक की उन्हें आवश्यकता प्रतीत हो रही थी। ऐसे विषम समय में वे अपनी प्रतिभा को सांसारिक माया-जाल मे फँसाकर नष्ट नहीं करना चाहते थे।

🔴 उधर माता बच्चे की ऐसी प्रवृति को देखकर खिन्न हो रही थी। वे अपने किशोर शंकर को यही समझाया करती थीं कि वह घर गृहस्थी सँभाले, आजीविका कमाए और विवाह कर ले।

🔵 किशोर शंकर को माता के प्रति अगाध निष्ठा थी। वे उनका पूरा सम्मान करते थे और सेवा-सुश्रूषा में रंच मात्र भी न्यूनता नहीं आने देते थे। फिर भी अंतरात्मा यह स्वीकार न कर रही थी कि मोहग्रस्त व्यक्ति यदि अविवेकपूर्ण किसी बात का आग्रह कर रहा हो तो भी उसे स्वीकार ही कर लिया जाए। माता की ममता का मूल्य बहुत है, पर विश्व-माता मानवता की सेवा करने का मूल्य उससे भी अधिक है। विवेक ने- "बडे के लिए छोटे का त्याग" उचित बतलाया है। अंतरात्मा ने ईश्वर की अतरंग प्रेरणा का अनुभव किया और उसी को ईश्वर का निर्देश मानकर शंकर ने विश्व-सेवा करने का निश्चय किया।

🔴 माता को कष्ट न हो, स्वीवृति भी मिल जाए। ऐसा कौन-सा उपाय हो सकता है-यही उनके मस्तिष्क में गूँजने लगा। सोचते-सोचते एक विचित्र उपाय सूझा। एक दिन माता पुत्र दोनों नदी मे स्नान करने साथ-साथ गए। माता तो किनारे पर ही खडी रही, पर बेटा उछलते-कूदते गहरे पानी तक चला गया। वहाँ उसने अपने उपाय का प्रयोग किया। अचानक चिल्लाया-बचाओ। कोई बचाओ 'मुझे मगर पकड़े लिए जा रहा है। बेटे की चीत्कार सुनकर माता घबडा गई। किकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में उन्हें कोई उपाय ही न सूझ रहा था। बेटे ने माता से कहा- 'माता मेरे बचने का एक ही उपाय अब शेष है। तुम मुझे भगवान् शंकर को अर्पित कर दो। वही मेरी प्राण रक्षा कर सकते है'' मर जाने से जीवित रहने का मूल्य अधिक है। भले ही लड़का संन्यासी बनकर रहेगा-यह निर्णय करते माता को देर न लगी। उन्होंने भगवान् शंकर की प्रार्थना की कि- मेरा बेटा मगर के मुख से निकल जाए तो उसे आपको समर्पित कर दूँगी। इतना कहते ही बेटे की आंतरिक प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वह धीरे-धीरे किनारे पर आ गया।

🔵 इस प्रकार विश्व-सेवा के प्रेम और मानवता की सेवा की सच्ची निष्ठा ने ममता और मोह पर विजय पाई। यह युवक शंकर-संन्यासी शंकराचार्य के रूप में धर्म एवं संस्कृति की महान् सेवा में प्रवृत हुए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 154, 155

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