शनिवार, 26 मार्च 2016

साधना से सिद्धि

 
प्रतिदिन प्रातःकाल अथवा सांयकाल एकान्त स्थान में चले जाओ। तुम्हारा चित्त चंचल या आकर्षित करने का कोई साधन न हो। शान्तचित से नेत्र मूँद कर बैठ जाओ। क्रमशः अपने मने की क्रियाओं का निरीक्षण करो। इन सब विचारों को एक-एक करके निकाल डालो, यहाँ तक कि तुम्हारे मन में कुछ भी न रहे। वह बिल्कुल साफ हो जाये। अब दृढ़तापूर्वक निम्न विचारों की पुनरावृति करो-

‘‘ मैं आज से एक नवीन र्माग का अनुसरण कर रहा हूँ, पुराने त्रुटियों से भरे हुए जीवन को सदा र्सवदा के लिए छोड़ रहा हूँ। दोषपूर्ण जीवन से मेरा कोई सरोकार नहीं। वह मेरा वास्तविक स्वरूप कदापि नहीं था।’’

‘‘अब तक मैं शृंगार, देह पूजा, टीप-टाप में ही संलग्र रहता था। दूसरों के दोष निकालने, मजाक उड़ाने, त्रुटियों, कमजोरियों के निरीक्षण तथा आलोचना करने में रस लेता था, पर अब मैं इस अन्धकारमय कूप से निकल गया हूँ। अब मैं इन क्षुद्र उलझनों में नही पड़ सकता। ये अभद्र भ्रांतियाँ, रोग, दुःख, शोक आदि मेरी आत्मा में प्रवेश नहीं कर सकतीं। संसार की क्षणभंगुर वासना तरंगे अब मुझे पथ विचलित नहीं कर सकतीं।’’

‘‘मैं मिथ्या अभिमान में दूसरों की कुछ परवाह नहीं करता था, मदहोश था, अपने को ही कुछ समझता था, किन्तु आत्मा के अन्दर प्रवेश करने से मेरा मिथ्या गर्व चूर्ण हो गया है। मुझे अपने पूर्व कृत्यो पर हँसी आती है।’’

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
साधना से सिद्धि वाङमय 5 पृष्ठ-8.32
कौन कहता है की आँसू मे वजन नही होता, अरे एक बूँद ढल जायें तो मन हल्का हो जाता!

एक आँसू गिरा दे किसी निर्दोष की आँख से तो भविष्य तबाह हो जाता! कौन कहता है की आँसूओं मे शक्ति नही होती, अरे बिना आँसूओं के तो भक्ति भी भक्ति नही होती!

एक राजा जिसे अपने साम्राज्य को बढ़ाने की बड़ी चाह थी और ऊपर से मांसाहारी भी था प्रजा पर अनेक कर लगाकर अपना खजाना भरता रहता था! एक बार वो किसी जंगल मे शिकार करने के लिये गया जंगल मे बहुत दुर निकल गया पानी की बड़ी प्यास लगने लगी अब भटकते भटकते रात हो गई पुरी रात भटका पर पानी न मिला!

सुबह एक कोई अपाहिज पानी की मटकी लिये हुये जा रहा था वो राजा उसके पास पहुँचा और राजा ने उस अपाहिज से कहा की ए भाई मैं प्यास से मर रहा हुं मुझे अपनी मटकी से पानी पिला दो तो अपाहिज रोने लगा उसकी आँखो से आँसूओं की धारा बहने लगी राजा ने उससे पूछा अरे पानी माँग रहा हुं तो रो क्यों रहे हो तो उस अपाहिज ने कहा हॆ देव यहाँ से दो कोस की दूरी पर एक कुआँ है और मैं ठहरा एक अपाहिज वहाँ तक जाऊँगा और वहाँ से पानी लेकर आऊँगा तब तक आपकी व्यथा मुझसे सहन न होगी और आपकी इतनी श्रद्धा नही दिख रही है की आप वहाँ तक चल सको बस इसी लिये मेरी आँखो मे आँसू आ गये !

पता नही की कौनसे अपराध किये थे मैंने न जाने किस निर्दोष की आँख मे आँसू दिये थे मैंने जिसकी ये सजा मैं भुगत रहा हुं पर आप चिन्ता न करो देव वो सामने भोले बाबा के शिवलिंग पर एक मटकी लगी हुई है शायद उसमे थोड़ा पानी हो सकता है अन्दर पुजारी जी होंगे वो आपको पानी पिला देंगे अच्छा राजन अब मैं चलता हुं!

राजा पहुँचा भोले बाबा के मन्दिर मे पुजारीजी ने पानी पिलाया तो राजा की आँखो से आँसू बहने लगे पुजारीजी ने पूछा तो आँसू और बढ़ने लगे और फिर राजा ने कहा और उस अपाहिज के बारे मे राजा बोलने लगे

देखा जब मैंने उसे तो स्तब्ध रह गई आँखे मेरी
पूँछ बैठा मैं उसे क्यों है आँसू आँखो मॆ तेरी
न बोला कुछ भी न बोला पर जब बार बार पुछा
तो उसने जो कहा तो शर्म से झुक गई आँखे मेरी
और जब गहरा चिन्तन किया तो पुरी जिन्दगी बदल गई मेरी


उसने कहा मुझ से रोती है बहुत रोती है आँखे मेरी
मैं कुछ करना चाहता हुं परमार्थ के लिये
पर जब देखता हूँ मैं की कोई मदद माँग रहा है मुझसे और जब वो देखता है मदद के लिये एक आशा भरी नजरो से मेरी तरफ और जब मैं पाता हुं अपने आपको बहुत विवश
तो आँखो मॆ आँसू आ जाते है मेरी

फिर मैंने उससे कह दिया अब कुछ न बोलो बिल्कुल भी न बोलो

क्योंकि आपकी आँखो मॆ आँसू आते है परमार्थ के लिये
और मेरी आँखो मॆ आँसू आते है स्वार्थ के लिये!


तब शर्म से झुक गई आँखे मेरी और अब सोचता हुं की ईश्वर ने मुझे इतना कुछ दिया पर मैने संसार को आँसूओं के सिवा कुछ न दिया, अपनी जिह्वा के लिये न जाने कितने निर्दोष पशुओं की आँखो मे आँसू दिये और उनका वध किया, अपने खजाने और अपनी लोभी प्रवर्ति को पुरा करने के लिये न जाने कितने निर्दोष और अबोधो की आँखो मे आँसू दिये!

फिर पुजारीजी ने कहा राजन आपकी आँखो से जो पश्चात्ताप के आँसू बहे उन्हे व्यर्थ न जाने देना और इस मानव देह को सार्थक करना और आगे से किसी भी आँख मे आँसू मत देना!
और राजा ने वही किया जो पुजारीजी ने कहा!
Dharma accepts and understands the practicalities of life

 
Dharma neither regards various forms of penance such as, religious austerity (e.g. fasting) as supreme nor attaches any importance to meaningless renunciation of physical pleasures.

Intention of Dharma is that individuals should experience bliss and happiness in their life. Such happiness could be spiritual as well as material [experienced through senses]. None of such happiness enjoyed within the boundaries of Dharma should be seen as condemnable.

In itself generating and maintaining wealth isn’t a sinful act. Dharma never prohibits such acts as long as the means used; do not harm other people. If the means are nefarious, such goals [generating wealth etc.] are condemned by Dharma. Dharma identifies such acts as being evil, forbids them and shows the right way of doing things.

Similarly, marrying to have good family is deemed as virtuous by Dharma. Any form of spiritual or material pursuits; be it religious observances or indulgence in luxury, wealth, marriage, etc. do not pose any hindrance to attaining perfection in life. This is true as long as they are done with an aim of facilitating ones own spiritual well-being and doing good to society. On the other hand, they will be looked down upon (by Dharma) if their focus shifts from enriching and progressing ones life to selfishness.
 
- Pt. Shriram Sharma Acharya
- Essence of Dharma and Its Significance Page 1.29
धर्म जीवन की शाश्वतता को आधार मानकर चलता है


धर्म तपस्या को ही सर्वोपरि नहीं मानता, न शारीरिक सुखों के निष्प्रयोजन, परित्याग को महत्त्व देता है ।

वह जीवन को आनन्दमय देखना चाहता है । आनन्द इन्द्रिय ग्राह्य भी हो सकता है और आत्मिक भी । इस तरह का कोई भी आनन्द धर्म की मर्यादा में निन्दनीय नहीं है ।

इसी तरह धन-सम्पत्ति आदि भी अपने आप में कोई पाप नहीं है । धर्म इसके लिए रोक नहीं लगता, लेकिन धन संग्रह करने के उपायों से किसी दूसरे का अहित होता हो तो वह धर्म की दृष्टी से निन्दनीय है । धर्म इस तरह के प्रयत्नों को बुरा बताकर उन पर रोक लगता है और सही मार्ग बताता है ।

इसी तरह उत्तम सन्तान लाभ के लिए विवाह करना, धर्म द्वारा अच्छा माना गया है । किसी भी रूप में धर्मपरायणता, सुखभोग, सम्पत्ति, विवाह आदि जीवन की पूर्णता के अवरोधक नहीं हैं, जब वे आत्म-कल्याण और समाज हित के लिए किये जाते हों, लेकिन जब इनका प्रयोजन जीवन की समृद्धि, विकास से दूर हटकर अपने आप में केन्द्रित हो जाता है, तभी ये अच्छे नहीं माने जाते ।

- पं श्रीराम शर्मा आचार्य
- धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म (वांग्मय 53)-1.21

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