शनिवार, 11 अगस्त 2018

👉 स्वाध्याय-सन्दोह

🔷 “धर्म की उन्नति से अन्यान्य विषयों में उन्नति अवश्यम्भावी है। यदि रक्त साफ और ताजा रहे तो देह में रोग का कोई कीटाणु (जर्म) प्रवेश नहीं कर सकता। धर्म ही हम लोगों का रक्त है। यदि इस रक्त-प्रवाह में कोई बाधा न पहुँचे और वह शुद्ध तथा ताजा रहे तो सभी बातों में कल्याण होगा। यदि यह रक्त शुद्ध हो तो राजनैतिक, सामाजिक अथवा कोई भी बाहरी दोष हो इतना ही नहीं, हमारे देश की घोर दरिद्रता भी दूर हो जायेंगे। जब तक शरीर अपने में रोग के जीवाणु को प्रवेश नहीं करने देता जब तक देह की जीवनी शक्ति क्षीण होकर रोग के जीवाणु को प्रवेश करने और बढ़ने नहीं देती, तब तक संसार के किसी रोग जीवाणु में शक्ति नहीं कि वह शरीर में रोग उत्पादन कर सके।

🔶 सामाजिक जीवन को विषय में भी यही बात है। जिस समय जातीय-शरीर दुर्बल हो जाता है उस समय जगत के राजनैतिक, सामाजिक, मानसिक और शिक्षा सम्बन्धी विषयों में सब प्रकार के रोगाणु प्रवेश करते है और रोग उत्पन्न करते है। उस समय एक मात्र कर्तव्य होगा लोगों में शक्ति का संचार, रक्त का शुद्ध करना, शरीर को तेज युक्त करना जिससे वह सब तरह के बाहरी विषों को देह में प्रवेश करने से रोके और भीतरी विष को निकाल दे। हमारा धर्म ही हमारे तेज, वीर्य, और यही क्यों जातीय-जीवन की भी मूल भित्ति है।”

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 मिसाल: तय किया गोशाला में रहने से लेकर एशियाड मेडलिस्ट बनने तक का सफर

🔷 एशियाड मेडलिस्ट खुशबीर कौर की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उनका परिवार आज भी उस दिन को याद करता है जब वे लोग गौशाला में रहा करते थे और देश की टॉप रेस वॉकर का परिवार एक टूटी चारपाई पर सोता था। 2014 एशियन गेम्स में रजत पदक जीतने वाली खुशबीर का परिवार तंगी के चलते दिन में एक या दो बार का खाना नहीं खाता था। गोशाला से वे किसी तरह एक टूटे-फूटे घर तक आए, जहां बारिश में छत टपकने लगती थी।

🔶 25 साल की खुशबीर अब पंजाब पुलिस में डीएसपी हैं और आज भी उस मुश्किल वक्त की यादें ताजा हैं। उनकी मां जसबीर कौर अमृतसर के रसूलपुर कलान गांव में रहती हैं। आने वाले एशियन गेम्स के लिए बेंगलुरु में एक कैंप का हिस्सा बनीं खुशबीर बताती हैं, 'यह बहुत मुश्किल सफर रहा।' खुशबीर ने छह साल की उम्र में ही अपने पिता बालकर सिंह को खो दिया था। इसके बाद उनकी मां ने पूरी हिम्मत से चार बेटियों और एक बेटे को कपड़े सिलकर और पास के गांवों में दूध बेचकर पाला।

 
गांव के घर में रहता है खुशबीर का परिवार।

🔷 आंखों में आंसू भरकर उनकी मां जसबीर कौर बताती हैं, 'बारिश के वक्त मैं, मेरी बच्चियां-बेटा और गायें सब एक कमरे के अंदर रहा करते थे। आज गांव में किसी से भी पूछो कि डीएसपी जसबीर के घर जाना है तो हर कोई रास्ता बता देगा।' पति के जाने के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी जहां जसबीर पर आई थी, जल्द ही बेटी ने उनका हाथ थाम लिया। खुशबीर ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में मेडल जीतने की शुरुआत की और परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले ली।

🔶 जसबीर कहती हैं, 'खुशबीर ने उस वक्त मेडल जीतने शुरू किए जब हमारे पास अच्छा खाने के लिए भी नहीं था। 2014 एशियन गेम्स में 20 किलोमीटर रेसवॉक में सिल्वर जीतने के बाद हमें सीमेंट से बनी छत मिल पाई।' खुशबीर की दो बहनें हरजीत और करमजीत भी स्पॉर्ट्स में हैं तो वहीं तीसरी धरमजीत स्पॉर्ट्स से जुड़ना चाहती है। उसका भाई बिक्रमजीत सेना में जाना चाहता है।

👉 कुछ ऐसे थे देश के पहले शहीद खुदीराम बोस

खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने ही उनको पाला था। बंगाल विभाजन (1905 ) के बाद खुदीराम बोस स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। हालांकि, वह अपने स्कूली दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। वे जलसे-जलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। नौवीं कक्षा के बाद ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। बाद में वह रेवलूशन पार्टी के सदस्य बने।

उनका बचपन बस बीता ही था, उनके साथी जब पढ़ाई और परीक्षा के बारे में सोच रहे थे, वह क्रांति की मशाल रौशन कर रहे थे, जिस उम्र में लोग जिंदगी के हसीन ख्वाब बुनते हैं, वह वतन पर निसार होने का जज्बा लिए हाथ में गीता लेकर फांसी के फंदे की तरफ बढ़ गए और देश की आजादी के रास्ते में अपनी शहादत का दीप जलाया। यह थे अमर शहीद खुदीराम बोस। खुदीराम के बगावती तेवरों से घबराई अंग्रेज सरकार ने मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी पर लटका दिया, लेकिन उनकी शहादत ऐसा कमाल कर गई कि देश में स्वतंत्रता संग्राम के शोले भड़क उठे। आज ही के दिन यानी 11 अगस्त, 1908 को ब्रिटिश सरकार ने सिर्फ 18 साल की उम्र में उन्हें फांसी पर लटका दिया था। आइये इस मौके पर उनसे जुड़ीं कुछ खास बातें जानते हैं...

🔷 ​परिचय

खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने ही उनको पाला था। बंगाल विभाजन (1905 ) के बाद खुदीराम बोस स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। हालांकि, वह अपने स्कूली दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। वे जलसे-जलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। नौवीं कक्षा के बाद ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। बाद में वह रेवलूशन पार्टी के सदस्य बने।

​🔶 पहली गिरफ्तारी

वह वंदेमातरम के पर्चे बांटते थे। पुलिस ने 28 फरवरी, सन 1906 को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बांटते हुए बोस को दबोच लिया। लेकिन बोस पुलिस के शिकंजे से भागने में सफल रहे। 16 मई, सन 1906 को एक बार फिर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। 6 दिसंबर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट की घटना में भी बोस भी शामिल थे।

​🔷 किंग्सफर्ड की हत्या की योजना

कलकत्ता (अब कोलकाता) में किंग्सफर्ड चीफ प्रेजिडेंसी मैजिस्ट्रेट को बहुत सख्त और क्रूर अधिकारी माना जाता था। क्रांतिकारियों का मानना था कि वह अधिकारी देशभक्तों खासतौर पर क्रांतिकारियों को तंग करता था। क्रांतिकारियों ने उसकी हत्या का फैसला किया। युगांतर क्रांतिकारी दल के नेता वीरेंद्र कुमार घोष ने घोषणा की कि किंग्सफोर्ड को मुजफ्फरपुर (बिहार) में ही मारा जाएगा। इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चंद को चुना गया।

​🔶 किंग्सफर्ड की जगह कैनेडी और उसकी बेटी की हत्या

ये दोनों क्रांतिकारी सूझबूझ वाले माने जाते थे। दोनों मुजफ्फरपुर पहुंचकर एक धर्मशाला में आठ दिन रहे। इस दौरान उन्होंने किंग्सफर्ड की दिनचर्या और गतिविधियों पर पूरी नजर रखी। उनके बंगले के पास ही क्लब था। अंग्रेजी अधिकारी और उनके परिवार के लोग शाम को वहां जाते थे। 30 अप्रैल, 1908 की शाम किंग्सफर्ड और उसकी पत्नी क्लब में पहुंचे। रात के साढे़ आठ बजे मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी अपनी बग्घी में बैठकर क्लब से घर की तरफ आ रहे थे। उनकी बग्घी का रंग लाल था और वह बिल्कुल किंग्सफर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उनके साथी ने किंग्सफर्ड की बग्घी समझकर उसपर बम फेंका, जिससे उसमें सवार मां-बेटी की मौत हो गई। वे दोनों यह सोचकर भाग निकले कि किंग्सफर्ड मारा गया है।

​🔷 फांसी की सजा

दोनों करीब 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। बोस पर पुलिस को शक हो गया और पूसा रोड रेलवे स्टेशन (अब यह स्टेशन खुदीराम बोस के नाम पर है) पर उन्हें घेर लिया। अपने को घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने खुद को गोली मार ली पर खुदीराम पकड़े गए। खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला। उन्होंने अपने बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने तो किंग्सफर्ड को मारने का प्रयास किया था। लेकिन, इस बात पर बहुत अफसोस है कि निर्दोष कैनेडी तथा उनकी बेटी गलती से मारे गए। यह मुकदमा केवल पांच दिन चला। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया।

🔶 ​स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा

मुजफ्फरपुर जेल में जिस मैजिस्ट्रेट ने उन्हें फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निडर होकर फांसी के तख्ते की ओर बढ़े थे। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे, जिसके किनारे पर ‘खुदीराम’ लिखा रहता था। स्कूल कालेजों में पढ़ने वाले लड़के इन धोतियों को पहनकर सीना तानकर आजादी के रास्ते पर चल निकले। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में जान न्योछावर करने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं। 

👉 किरायेदार की दास्तान


🔷 एक नगर मे एक बहुत ही आलीशान भवन बना हुआ था उस भवन मे एक सेठजी रहते थे दो खाली कमरे थे वहाँ दो किरायेदार आये और सेठजी से प्रार्थना करने लगे की हमें अपना मकान किराये पर दे दीजिये उनकी हालत देखकर सेठजी को रहम आ गया सेठजी बहुत भोले और भले पुरूष थे!

🔶 सेठजी ने कहा की मैं मकान किराये पर तो दे दुं पर देता हुं निश्चित अवधि के लिये और कोर्ट से लिखापढ़ी कराकर देता हुं ताकि बाद मे कोई लफड़ा न हो और जब मैं चाहूं तब आपको मकान खाली करना पड़े यदि मॆरी ये शर्ते स्वीकार है तो आ जाओ नही तो दुनियाँ बहुत लम्बीचौड़ी है आप जा सकते है! और हाँ मुझे गन्दगी पसंद नही है यदि आप साफ सफाई रख सकते हो तो लेना बाकी मत लेना ! किरायेदार ने शर्तों पर मकान ले लिया!

🔷 हर महीने वो किराया देते थे धीरे धीरे बहुत समय व्यतीत हुआ एक दिन मकान मालिक ने उन दोनो से कहा की आप मकान खाली कीजिये तो एक ने तत्काल मकान खाली कर दिया और वहाँ से आगे चला गया!

🔷 पर वो जो दूसरा था वो कहे की मकान तो मेरा है क्यों खाली करूँ तो सेठजी अपने साथ पहलवानों को लाये और उसकी खुब पिटाई की और पिटाई करते करते उसे मकान से बाहर निकाल दिया!

🔶 अब वो थाने मे हवलदार साब के पास पहुँचा सेठजी के खिलाप मुकदमा दर्ज करवाया और थानेदार सेठजी को लेने पहुँचे पर जब थानेदार जी को हकीकत पता चली तो उस किरायेदार को डंडे से पिटा और जेल मे डाल दिया!

🔷 पहले और दुसरे किरायेदार मे कितना अन्तर था!

🔶 एक ने किराये के मकान को अपना समझा साफ सफाई भी रखी और जैसै ही सेठजी का आदेश हुआ तत्काल मकान खाली भी कर दिया! और दुसरा मकान को भी गंदा किया और मालिक भी बनना चाहा तो डंडे पड़े!

🔷 यदि वो दुसरा भी किरायेदार बनकर रहता मालिक बनने की कोशिश न करता तो उसे यु डंडे न पड़ते और कारावास की सजा न होती!

🔶 हम सब यहाँ एक किरायेदार ही है इससे ज्यादा और कुछ नही! ये काया और ये माया इन्हे व्यवहार मे अपना कह लिजिये पर अधिकारपूर्वक मत कहना क्योंकि पता नही मकान मालिक कब मकान खाली करवा दे!

🔷 ये कभी नहीं भुलना चाहिये की हम सब किरायेदार है और किरायेदार बनकर रहेंगे तो सदा लाभ मे रहेंगे मालिक बनने की कोशिश की तो डंडे पडेंगे! मालिक बनने की कोशिश कभी नहीं करनी चाहिये क्योंकि ये काया किराये का एक मकान है और हम केवल एक किरायेदार है और एक दिन किराये के इस मकान को खाली करना ही पड़ेगा।

🔶 राम सुमिरन और राम सेवा से इसका ईमानदारी से किराया अदा करते हुये चले!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 25)

👉 प्रतिभा संवर्धन का मूल्य भी चुकाया जाए
  
🔷 व्यक्ति और समाज अब इस कदर गुँथ गए हैं कि दोनों का पारस्परिक तालमेल पानी और मछली जैसा अविच्छिन्न हो गया है। कोई निजी उन्नति से, निजी सुविधा संपादन भर से सुखी नहीं रह सकता। संबद्ध वातावरण यदि विपन्न है तो किसी सज्जन की भी शांति सुरक्षित नहीं रह सकती! अग्नि और महामारी किसी घर विशेष तक सीमित नहीं रहती। गुंडागर्दी एक जगह पनपेगी तो समूचे क्षेत्र में विग्रह खड़ा करने का निमित्त कारण बनेगी। बढ़ी हुई जनसंख्या और आधुनिक प्रगति के फलस्वरूप अब निजी जीवन को सही बना भर लेने से काम चलने वाला नहीं। इसलिए जनमानस के गिरे हुए स्तर को उभारना प्रकारांतर से अपनी और अपने परिकर की सुरक्षा करना है। सामूहिक जीवन मनुष्य की नियति है। इन दिनों सामूहिकता और भी अनिवार्य हो गई है। अपने मतलब से मतलब रखने की नीति अपनाने वाले यह नहीं समझते कि समुन्नत समाज के घटक ही वास्तव में सुखी रह सकते हैं।
  
🔶 प्रतिभा संपादन के लिए विशेषतया उच्चस्तरीय वातावरण में एक साथ रहना, उत्कृष्ट सोचना और आदर्शवादी क्रियाकलापों में निरत रहना चाहिए। निजी सुधार एवं अभ्युदय भी इसके बिना नहीं हो सकता। अपनी स्थिति लोकसेवी और उदारचेता सद्गुणी रखे बिना, किसी को भी शारीरिक बनावट मात्र से प्रभावशाली होने का अवसर नहीं मिल सकता। सद्गुणों का बाहुल्य एवं अभ्यास ही किसी को इस योग्य बनाता है कि वह अन्यान्यों का सम्मान एवं सहयोग अर्जित कर सके। इसी सफलता के आधार पर किसी की प्रतिभा और गरिमा का वास्तविक मूल्यांकन हो सकता है।
  
🔷 आवश्यक है कि संकीर्ण स्वार्थपरता की पूति में ही अपनी समूची क्षमताएँ न खपा दी जाएँ। इसमें जितना लाभ दिखाई पड़ता है उसकी तुलना में घाटा अधिक है। व्यापक स्तर का सार्वजनीन स्वार्थ ही परमार्थ है। परमार्थ परायण अपना निज का हितसाधन तो निश्चित रूप से करते ही हैं, साथ ही चंदन वृक्ष की तरह निकटवर्ती लोगों को भी गरिमा प्रदान करते हैं। प्रतिभा संपादन के लिए जिस प्राथमिक कक्षा में पढ़े बिना काम नहीं चलता वह है-सेवासाधना उच्चस्तरीय सेवासाधना में दो ही तत्त्व प्रमुख है-एक सत्प्रवृत्ति संवर्धन, दूसरा दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। इन दो प्रयासों को अपनाने के लिए अपने समय साधनों का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहने का महत्त्व समझा जाना चाहिए। एक सुनिश्चित व्रतधारण कर उसका निर्वाह करते रहने में अपनी श्रद्धा-निष्ठा एवं मनस्विता का परिचय देना चाहिए। इसे ‘प्रतिभा परिवर्धन’ की अनिवार्य फीस मानकर चलना चाहिए। युग परिवर्तन का सरंजाम इसी माध्यम से संपन्न होगा।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 31
http://awgpskj.blogspot.com/2018/08/1-24_9.html

👉 Do Not Panic or Perplex

🔷 Life is full of challenges and testing moments! Many a times the adverse circumstances are so intense that one just can’t bear  them, he loses patience, gets anxious and panicked; cries on his destiny and helplessness… But this doesn’t solve the problem. The only source of definite support in such cases is – prudence and patience.

🔶 Ups and downs, good and bad experiences are natural phases of human life. We must remember this fact and convince ourselves of the truth that wisdom and pure knowledge (gyana) are the only keys to conquer the agonies caused by the tides of adversities or tragedies. Firm faith in God’s grace and justice is a must in such testing moments of sufferings. We must understand that our knowledge is too limited to grasp the system of God. Whether we realize it at that time or not, the circumstances and experiences that appear so painful to us also occur in fact for our welfare only.

🔷 Because of our half or illusory knowledge and narrow attitude, we cannot grasp the real cause or purpose behind the happenings in our life. We must accept it that major cause of our agonies and anxiety is our ignorance; we want everything to conform to our expectation, our favor. But the course of life has many dimensions, beyond our perception. Faith in absolute justice and mercy of the Omniscient God is all the more important in the moments of hardships and pains. This gives us instant courage and light and helps maintain our calm without which we can’t even think properly. All religious scriptures preach the importance of the feeling of content and peace in all circumstance. It is indeed the nectar source of annulling all worries and panics even in the difficult, tragic
situations. Adoption of peace, patience and satisfaction does not mean that you should not transact your duties or progress in your life. Rather, it implies that you should complete all your tasks, all duties, with mental stability and calm and a sense of inner faith in all circumstances.

📖 Akhand Jyoti, April 1943

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (अन्तिम भाग)

🔷 वचन का पालन, समय की पाबन्दी, नियमित दिनचर्या, शिष्टाचार, आहार विहार की नियमितता, सफाई व्यवस्था आदि कितनी ही बातें ऐसी है जो सामान्य प्रतीत होते हुए भी जीवन की सुव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पाश्चात्य देशों में इन छोटी बातों पर बहुत ध्यान दिया जाता है, फलस्वरूप भौतिक उन्नति के रूप में उन्हें उसका लाभ भी प्रत्यक्ष मिल रहा है। स्वास्थ्य, समृद्धि और ज्ञान की दृष्टि से पाश्चात्य देशों ने जो उन्नति की है उसमें इन छोटी बातों का बड़ा योग है। इन बातों के साथ-साथ यदि आध्यात्मिक सद्गुणों का समन्वय भी हो जाय तो फिर सोना और सुगन्धि वाली कहावत ही चरितार्थ हो जाती है।

🔶 ऊपर की पंक्तियों में जीवन विद्या के कुछ पहलुओं की थोड़ी चर्चा की गई है। ऐसे कितने ही कोणों से मिलकर एक सन्तुलित जीवन बनता है। यह सन्तुलित जीवन व्यक्ति को स्वस्थ विकास की ओर ले जाता है। और ऐसे ही सुविकसित व्यक्तियों का समाज किसी राष्ट्र को गौरवशाली बनाता है।

🔷 आज चारों ओर अगणित कठिनाइयाँ, परेशानियाँ और उलझने दिखाई पड़ती है उनका कारण एक ही है- अनैतिक, असंस्कृत जीवन। समस्याओं को ऊपर-ऊपर से सुलझाने से काम न चलेगा वरन् भूल कारण का समाधान करना पड़ेगा मनुष्य के जीवन दिव्य देवालयों की तरह पवित्र, ऊँचे और शानदार हों तभी क्लेश और कलह से, शोक और संताप से, अभाव और आपत्ति से छुटकारा मिलेगा। व्यक्ति यदि भगवान के दिव्य वरदान मानव जीवन का समुचित लाभ उठाना चाहता हो तो उसे जिन्दगी जीने की समस्याओं पर विचार करना होगा और सुलझे हुए दृष्टिकोण से अपनी गति विधियों का निर्माण करना होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.7

👉 आन्तरिक निकटता चाहिए

🔷 दूसरों की तरह हमारे भी दो शरीर हैं, एक हाड़-मांस का, दूसरा विचारणा एवं भावना का। हाड़-मांस से परिचय रखने वाले करोड़ों हैं। लाखों ऐसे भी हैं जिन्हें किसी प्रयोजन के लिए हमारे साथ कभी सम्पर्क करना पड़ा है। अपनी उपार्जित तपश्चर्या को हम निरन्तर एक सहृदय व्यक्ति की तरह बाँटते रहते हैं। विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों एवं उलझनों में उलझे हुए व्यक्ति किसी दलदल में से निकलने के लिए हमारी सहायता प्राप्त करने आते रहते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका भार हलका करने में कोई कंजूसी नहीं करते।

🔶 इस संदर्भ में अनेक व्यक्ति हमारे साथ संपर्क बनाते और प्रयोजन पूरा होने पर उसे समाप्त कर देते हैं। कितने ही व्यक्ति साहित्य से प्रभावित होकर पूछताछ एवं शंका समाधान करने के लिए, कितने ही आध्यात्मिक साधनाओं के गूढ़ रहस्य जानने के लिए, कई अन्यान्य प्रयोजनों से आते हैं। इनकी सामयिक सेवा कर देने से हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जाता है। उनके बारे में न हम अधिक सोचते हैं और न उनकी कोई शिकायत या चिंता करते हैं।

🔷 हमारे मन में भावनाएँ उनके लिए उफनती हैं जिनकी पहुँच हमारे अंतःकरण एवं भावना स्तर तक है। भावना शरीर ही वास्तविक शरीर होता है। हम शरीर से जो कुछ हैं, भावना की दृष्टि से कहीं अधिक है। हम शरीर से किसी  की जो भलाई कर सकते हैं उसकी अपेक्षा अपनी भावनाओं, विचारणाओं का अनुदान देकर कहीं अधिक लाभ पहुँचाते हैं। पर अनुदान ग्रहण वे ही कर पाते हैं जो भावनात्मक दृष्टि से हमारे समीप हैं। जिन्हें हमारे विचारों से प्रेम है, जिन्हें हमारी विचारणा, भावना एवं अंतःप्रेरणा का स्पर्श करने में अभिरुचि है उन्हीं के बारे में यह कहना चाहिए कि वे तत्त्वतः हमारे निकटवर्ती एवं स्वजन संबंधी हैं। उन्हीं के बारे में हमें कुछ विशेष सोचना है, उन्हीं के लिए हमें कुछ विशेष करना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जुलाई 1966 पृष्ठ 42

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 33)

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई...