शुक्रवार, 30 जून 2017

👉 उदारता और संकीर्णता :-

🔴 राजा सत्यनारायण की दो अलग अलग वाटिका मे एक विशेष वृक्ष था और राजा स्वयं अपने हाथो से उन वृक्षों को जल देने जाते थे और उन्हे सींचते व हमेशा हराभरा बनाये रखते थे!

🔵 एक बार उन्हे अचानक लम्बी अवधी के लिये राज्य से बहुत दुर जाना पड़ा जाते जाते उन्होंने उन वृक्षों की जिम्मेदारी अपनी दो सन्तानों को दी और उन्हे कहा की तुम दोनो का एक ही कार्य है की तुम्हे इन वृक्षों को अपनी जान से ज्यादा सम्भालकर रखना है और याद रखना की इनकी हरियाली समाप्त न हो पाये अन्यथा कहर ढा जायेगा सारा राज्य समाप्त सा होकर रह जायेगा !

🔴 एक वर्ष के बाद राजा पुनः अपने राज्य मे लोटे तो उन्होंने देखा की एक वृक्ष तो हराभरा है और दूसरा खड़ा तो है पर पुरी तरह से सूखा हुआ था!

🔵 राजा ने तत्काल दोनो संतानों को बुलाया और कहा क्यों रे तुमने इन्हे पानी नही दिया तो एक संतान ने कहा हॆ आदरणीय पिताश्री पानी तो हम दोनो ने ही दिया पर इसने वृक्ष की जड़ को समाप्त कर दिया हालाँकि इसने कोई कमी न रखी परन्तु ये जड़ को न बचा पाया और वृक्ष भीतर ही भीतर समाप्त होता चला गया और मैने इसे बहुत समझाया की जड़ को बचा नही तो पुरा वृक्ष समाप्त हो जायेगा परन्तु इसने मेरी एक न सुनी और अब पश्चाताप कर रहा है पर अब बहुत देर हो चुकी है...!

🔴 पर जाते समय मैने कहा था की वृक्ष को खुशहाल रखना है और फल प्राप्त करना है तो जड़ का विशेष ध्यान रखना...!

🔵 हाँ पिताश्री , और आपके कथनानुसार और आपकी कृपा से मैने जड़ को बचा लिया इसलिये ये वृक्ष हराभरा है !

🌹👉 सारांश

🔴 ये सारी सृष्टि और मनुष्य की सारी जिन्दगी एक वृक्ष की तरह ही तो है और "राम" इस सॄष्टि के मूलतत्व है और जिस जिस ने संकीर्णता और विकारों की ज्वाला से  "मूल" को बचा लिया उसके जीवन का वृक्ष कभी नही सूखा और जिसने संकीर्णता की चादर ओढ़ ली एकदिन उसका समूल विनाश हो गया !

🔵 यहाँ दो चादर है एक उदारता की दूसरी संकीर्णता की जिसने उदारता की चादर ओढ़ ली एकदिन उसके लिये सारा जगत "राममय" हो गया वो हर जीव मे , सारी सृष्टि मे , कणकण मे अपने "आराध्य" को देखता है और उसके मानव जीवन का लक्ष्य हराभरा हो जाता है !

🔴 उदारता ही जीवन है और संकीर्णता ही मृत्यु और उदारतापूर्वक अपने आराध्य के मार्ग पे चलते रहना और एक दिन उस अवस्था को पाने का प्रयास करना की हमें हर जीव और कण कण मे अपने आराध्य दिखने लगे जैसे की भक्त प्रहलाद को सर्वत्र नारायण ही दिखाई देते थे और ये उज्जवल अवस्था संकीर्णता से नही उदारता से प्राप्त की जा सकती है इसलिये जिन्दगी मे उदारवादिता के साथ आगे बढ़ना संकीर्णता से नही क्योंकि संकीर्ण एक दिन अशांति के गहरे अन्धकार मे लुप्त हो जाते है।

2 टिप्‍पणियां:

👉 रास्ते की बाधा....

🔴 बहुत पुराने समय की बात है एक राज्य के राजा ने अपने राज्य के मुख्य दरवार पर एक बड़ा सा पत्थर रखवा दिया इस पत्थर के रखवाने का मुख्य कारण...