शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

👉 *गृहस्थ-योग (भाग 22) 3 Dec*

🌹  *गृहस्थ योग से परम पद*

🔵  अब दूसरी ओर चलिये किसी आदमी द्वारा भूल से, मजबूरी से, या गैर जानकारी से कोई अनुचित बात हो जाती है और जानकारी होने पर पता चलता है तो उस अनुचित बात के लिये भी क्षमा कर दिया जाता है। अदालतें भी अपराधी की नीयत पर मुख्यतया ध्यान रखती है। यदि अपराधी की नीयत बुरी न साबित हो तो अपराधी को कठोर दंड का भागी नहीं बनना पड़ता।

🔴  जीवन के हर एक काम की अच्छाई, बुराई कर्ता की भावना के अनुरूप होती है जीवन भले ही सादा हो पर यदि विचार उच्च हैं तो जीवन भी उच्च ही माना जायेगा। रुपये-पैसे या काम के बड़े आडम्बर से पुण्यफल का विशेष सम्बन्ध नहीं है। एक अमीर आदमी रुपये के बल से बड़े-बड़े ब्रह्मभोज, पाठ-पूजा, तीर्थ-यात्रा, कथा-पुराण, मन्दिर-मठ, कुआं-बावड़ी, सदावर्त, यज्ञ-हवन आदि की व्यवस्था आसानी से कर सकता है।

🔵  दस लाख रुपया अनुचित रीति से कमा कर दस हजार रुपया इस प्रकार के कार्यों में लगाकर धर्मात्मा बनता है। दूसरी ओर एक गरीब आदमी जो ईमानदारी की मेहनत मजदूरी करता है, वह थोड़े से पैसे कमाता है जिससे कुटुम्ब का भरण-पोषण कठिनाई से हो पाता है बचता कुछ नहीं, ऐसी दशा में वह बेचारा भला ब्रह्मभोज, तीर्थ-यात्रा, यज्ञ अनुष्ठान आदि की व्यवस्था किस प्रकार कर पावेगा? यदि वह नहीं कर पाता है तो क्या वह धर्महीन ही रह जायेगा? क्या दुनिया की भौतिक चीजों की भांति ही पुण्यफल भी रुपयों से ही खरीदा जाता है?

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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