शनिवार, 21 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 30)

🌞  हिमालय में प्रवेश

गर्जन-तर्जन करती भेरों घाटी

🔵 सोचता हूं कि सोरों आदि स्थानों में जहां मीलों की चौड़ाई गंगा की है वहां जलधारा धीमे-धीमे बहती रहती है वहां प्रवाह में न प्रचण्डता होती है और न तीव्रता। पर इस छोटी घाटी के तंग दायरे में होकर गुजरने के कारण जल धारा इतनी तीव्र गति से बही। मनुष्य का जीवन विभिन्न क्षेत्रों में बंटा रहता है बहु सुखी रहता है उसमें कुछ विशेषता पैदा नहीं हो पाती पर जब एक विशिष्ट लक्ष को ले कर कोई व्यक्ति उस सीमित क्षेत्र में ही अपनी सारी शक्तियों को केन्द्रित कर देता है तो उसके द्वारा आश्चर्य जनक उत्साह वर्धक परिणाम उत्पन्न होते देखे जाते हैं। मनुष्य यदि अपने कार्य क्षेत्र को बहुत फैलाने, अनेक और अधूरे काम करने की अपेक्षा अपने लिये एक विशेष कार्य क्षेत्र चुन ले तो क्या वह भी इस तंग घाटी में गुजरते समय उछलती गंगा की तरह आगे बढ़ सकता है? उन्नति नहीं कर सकता?

🔴 जलधारा के बीच पड़े हुए शिला खण्ड पानी से टकराने के लिए विवश कर रहे थे। इसी संघर्ष में गर्जन-तर्जन हो रहा था और छोटे रुई के गुब्बारों के बने पहाड़ की तरह ऊपर उठ रहे थे। सोचता हूं यदि कठिनाइयां जीवन में न हो तो व्यक्ति की विशेषताएं बिना प्रकट हुए ही रह जायं। टकराने से शक्ति उत्पन्न होने का सिद्धान्त एक सुनिश्चित तथ्य है। आराम का शौक-मौज का जीवन विलासी जीवन निर्जीवों से कुछ ही ऊंचा माना जा सकता है।

🔵 कष्ट सहिष्णुता, तितीक्षा, तपश्चर्या एवं प्रतिरोधों से बिना खिन्नता मन में लाये वीरोचित भाव से लिपटने का साहस यदि मनुष्य अपने भीतर एकत्रित करले तो उसकी कीर्ति भी उस आज के स्थान की भांति गर्जन-तर्जन करती हुई दिग्दिगंत में व्याप्त हो सकती है, उसका विशेषतायुक्त व्यक्तित्व छींटों के उड़ते हुए फुवार की तरह से ही दिखाई दें सकता है। गंगा डरती नहीं, न शिकायत करती है, वह तंगी में होकर गुजरती है, मार्ग रोकने वाले रोड़ों से घबराती नहीं वरन् उनसे टकराती हुई अपना रास्ता बनाती है। काश हमारी अन्तःचेतना भी ऐसे ही प्रबल वेग से परिपूर्ण हुई होती तो व्यक्तित्व के निखरने का कितना अमूल्य अवसर हाथ लगता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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