मंगलवार, 27 जून 2017

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 7)

🔴 परिणामों के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता। जो परिणाम आपके हाथ में नहीं हैं, फिर क्यों आप ऐसा करते हैं कि उनके बारे में इतना ज्यादा लालच बनाये रखें और अपनी शान्ति को खो बैठें। आप केवल कर्तव्य की बात सोचिए, केवल माली की बात सोचिए, मालिक की बात खत्म, अधिकार की बात खत्म। कर्तव्य आपके हाथ में हैं, अधिकार दूसरों के हाथ में हैं। दूसरे देंगे तो अधिकार मिलेगा, नहीं देंगे, तो कैसे मिलेगा? आप अधिकार को लौंग मानिए और अपने कर्तव्यों को, जिम्मेदारी को उससे सुगन्धित कीजिए।

🔵 एक और बात मैं कहता हूँ, आप अपने स्वभाव में से एक और चीज को बदल सकते हैं। खीज़ बदल दीजिए, नाउम्मीदी की खीज़, अभावों की खीज़। आप खीज़ को छोड़कर एक नई चीज ग्रहण कर लें—मुसकराना। आप हर समय मुसकराने की कोशिश कीजिए, बनावटी ही मुसकराहट, फिर देखिए आपके स्वभाव में किस तरह परिवर्तन होता है? मन को हल्का-फुल्का रखें, खिलाड़ी की तरह जिन्दगी जिएँ, नाटक के तरीके से अभिनय तो आप कीजिए; पर इतने ज्यादा मशगूल मत हो जाइए, जिससे आपकी स्वाभाविक प्रसन्नता ही चली जाए। आप हँसते रह सकते हैं। ताश खेलते समय में बादशाह काट दिया, बेगम काट दी, गुलाम भी काट दिया, सब काट दिये; लेकिन तब भी चेहरे पर शिकन नहीं। आप ऐसा ही कीजिए।

🔴 आपको प्रसन्नता हो, खुशी के, सफलताओं के मौके आएँ, ठीक हैं, आप अच्छे रहिए; लेकिन जब मुसीबतों के मौके आएँ, तब? तब भी आप प्रसन्न रहिए, मुसकराते रहिए। मुसीबतें जो-जो आती हैं, वह आपको मजबूत बनाने के लिए आती हैं, आपकी हिम्मत और दिलेरी जताने के लिए आती हैं, आपकी समझदारी को तीखा करने के लिए आती हैं और आपका व्यक्तित्व सोने में तपाकर खरा जैसा बना देने के लिए आती हैं। आप मुसीबतों की भी शोहबत कीजिए। यह नहीं कहता हूँ कि मुसीबतों को न्यौत बुलाइए; लेकिन मुसीबतें जब आएँ, तब घबड़ाइए मत, हिम्मत से काम लीजिए। ऐसा आप नहीं कर पायेंगे क्या? आप ऐसा ही कीजिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 भगवान की कृपा या अकृपा

🔵 एक व्यक्ति नित्य हनुमान जी की मूर्ति के आगे दिया जलाने जाया करता था। एक दिन मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा- ”मैंने हनुमान जी क...