मंगलवार, 27 जून 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 June

🔴 सर्वव्यापी निराकार सत्ता से व्यक्तिगत मैत्री इस प्रकार नहीं जगायी जा सकती जैसे कि दुनियादार मतलब के लिए गधे को भी बाप बना लेते हैं और स्वार्थ सिद्ध न होने पर उसके साथ उपेक्षा या शत्रुता का व्यवहार करने लगते हैं। स्मरण रहे ईश्वर पर किसी की निन्दा प्रेरणा का प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने सामने वालों को सदा महानता अपनाने की प्रेरणा देता है और जिसने इस अनुशासन को जितनी मात्रा में अपनाया, उसे उतनी ही मात्रा में अपने स्नेह एवं अनुग्रह प्रदान करता है।

🔵 ईश्वर के निकटवर्ती एवं विश्वासी वे हैं जो उसके इस विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न करते हैं, जो अपने आप को मलीनताओं से छुड़ाकर अधिक से अधिक पवित्र और प्रखर बनाने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः जीवन साधना ही सच्ची ईश्वर उपासना है। पूजाकृत्य ऐसी ही मनोभावना विकसित करने के लिए अपनाये जाते हैं।
                                              
🔴 मनुष्य के मस्तिष्क को यदि भानुमति का पिटारा कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी, क्योंकि इसमें इतनी और ऐसी-ऐसी अद्भुत और आश्चर्यजनक क्षमताएँ भरी पड़ी हैं, जिन्हें यदि जीवन्त जाग्रत कर लिया जाय, तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि मनुष्य दीन-हीन स्थिति में पड़ा नहीं रह सकता। यदा-कदा यही क्षमताएँ दुर्घटनावश जग पड़ती है, तो हर कोई यह विश्वास करने लगता है कि यदि प्रयासपूर्वक मनुष्य इन्हें जगा ले, तो मनुज - चोले में ही वह नारायण की क्षमता अर्जित करने में सफल हो सकता है ।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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