रविवार, 5 फ़रवरी 2017

👉 नौ सौ बच्चों के स्नेहपूर्ण पिता

🔴 शार्लोट (उत्तरी कैरोलाइना) के विला हाइट्स प्राथमिक स्कूल में चले जाइए। वहाँ के प्रधानाध्यापक श्री राल्फ क्लाइन को आप सदा बच्चों की चिंता में मग्न पायेंगे। इस शाला में नौ सौ बच्चे है। श्री राल्फ क्लाइन का बच्चों के प्रति अत्यंत की स्नेहसिक्त है।

🔵 अपनी कुर्सी पर बैठकर कार्य तो वे बहुत ही कम करते है। अधिकांश समय वे विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के बीच गलियारों में घूमते हुये ही बिताते हैं, खाली समय मे भी वे विशेषत: ऐसे ही विद्यार्थियों को उद्बोधन देते रहते हैं, जिनकी रुचि पढ़ने-लिखने में कम होती है या जो किसी विशेष कमी के शिकार होते है।

🔴 इस शाला के बच्चों के लिए उनके सद्भाव, सद्व्यवहार, स्नेह तथा आत्मीयता की उपयोगितायों और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि उसमे अधिकांशत: पिछडे वर्ग के बच्चे ही शिक्षा पाते है।

🔵 किसी-किसी को तो जीवन की मूल आवश्यकताओ की पूर्ति के साधन भी उपलब्ध नहीं होते।

🔴 श्री क्लाइन का मत है कि जब तक बच्चे की मूल तथा प्रारंभिक आवश्यकताऐं पूर्ण नहीं होती-उससे अच्छी पढाई, या किसी भी कुशलता अथवा सफलता की आशा करना व्यर्थ है। उन्होंने अपनी शाला में दोपहर के निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की है। कभी-कभी नाश्ता भी दिया जाता है।

🔴 वे स्वयं प्रत्येक कठिनाइ का हल निकालकर, छात्रों तथा शिक्षकों की समस्याओं का समाधान करते हैं। उनका व्यवहार उन सबके प्रति वैसा ही है, जैसा किसी परिवार के मुखिया का होता है। बच्चों से असीम स्नेह-अतुल प्यार तथा आत्मीयतापूर्ण अपनापन। किंतु साथ ही इतनी स्वतंत्रता भी नहीं कि उच्छृंखलता को किसी प्रकार का बढावा मिले।

🔵 उनके प्रशिक्षण का ढंग अत्यंत ही अनुशासित तथा व्यवस्थित है। प्रत्येक विद्यार्थी के विषय में वे पूरी जानकारी रखते हैं कि उसकी मनोभूमि किस स्तर की है उसी प्रकार वे उससे व्यवहार तथा आशाएँ रखते हैं।

🔴 उनका कहना है कि बच्चे अपनी सहज ग्रहणशीलता के आधार पर यह जान जाते हैं कि आप उनका ध्यान रखते हैं या नहीं। अपने शिक्षको को भी उन्होंने इस प्रकार के निर्देश दे रखे हैं कि वे बालक बालिकाओं से अत्यंत ही प्रेम पूर्ण व्यवहार करें। गलती भी समझाएँ, पर उचित तथा मनोवैज्ञानिक ढंग से।

🔵 हाँ और यदि कोई बच्चा सीधे-सीधे समझाने तथा प्रयत्न करने पर भी सही रास्ते पर नहीं आता, तब कडाई का व्यवहार भी करते हैं उसी प्रकार जैसे एक अनुभवी पिता अपने बच्चों को गलत राह जाने से रोकता है। उनका अपना भी यही मत है कि बच्चों के मस्तिष्क मे यह बात भली-भॉति बैठा देनी चाहिए कि शिक्षक उनके साथ तभी कड़ा बर्ताव करता है, जबकि कुछ गलत कार्य मना करने पर भी करते है और शिक्षक तब बहुत प्यार करते हैं-जब बच्चे कोई अच्छा और उत्साहवर्द्धक कार्य करते है।

🔴 श्री क्लाइन-अपने आप में आदर्श शिक्षक के एक उदाहरण हैं। चालीस वर्ष की अवस्था में भी युवकों जैसी स्फूर्ति तथा उत्साह एवं हँसमुख स्वभाव उनके व्यक्तित्व का विशेष आकर्षण  है। आज के शिक्षकों को जो अपना उत्तरदायित्व पूर्ण रूप से नहीं निभाते इनसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 11, 12

1 टिप्पणी:

  1. ऋषियों द्रारा अध्यापन की यही परम्परा रही है | इसे पुनुरुज्जीवित करने की महती आवश्यकता है |

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