मंगलवार, 4 अक्तूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 47)

🔵 सच्चा ज्ञान  सदैव एक चेतन अनुभूति की प्रक्रिया है। विचारों को आत्मसात् करना भोजन ग्रहण करने के समान ही हमारे चेतन व्यक्तित्व को स्पर्श करता है तथा उस पर प्रभाव डालता है। स्नायुजालों को, विचारों को अवश्य आत्मसात् करना चाहिये तब समस्त शरीर ही चैतन्यमय हो उठता है। शरीर आत्मा हो उठता है। इसी अर्थ में कुछ आचार्यों ने कहा है कि मैं शरीर से भी चिन्मय हूँ। इसीलिए गुरु की शारीरिक सेवा भी एक सौभाग्य हैं। तब शरीर स्वयं चैतन्य की एक प्रक्रिया बन जाता है।

🔴 वत्स! एक बहुत बड़ा कार्य जो तुम्हें करना होगा वह है आत्मसंपर्क। अभी तुम्हारे मन की एकाग्रता अधिकांश परिस्थितियों तथा वातावरण पर निर्भर है।तुम दूसरों से संपर्क करने की आवश्यकता अनुभव करते हों। किन्तु दूसरे का मन तुम्हें थोड़ी उत्तेजना भर दे सकता है। जब तुम दूसरों से बातचीत करते हो तब भी तो स्वयं अपने आपसे भी बात करते हो। किन्तु ज्ञान जो सच्चा प्रेरक कह भीतर से आना चाहिये। दूसरों पर क्यों निर्भर रहोगे ? गैंडे के समान अकेले बढ़ चलो।

🔵 वत्स! मन स्वयं ही गुरु हो जाता है। यह एक प्राचीन उपदेश है। क्यों? क्योंकि मन पर आत्मसाक्षात्कार के लिए जोर डालने वाले तुम स्वयं ही तो दिव्य हो। मैं तथा अन्य सभी उस महान सत्य के विभिन्न पथ हैं। जब मैं शरीर में था, तुम्हारे स्तर पर के चैतन्य का आश्रय किया था, वह मानो एक खिड़की थी जिससे तुम अनंत को देख पाते थे। किन्तु वह चेतना जो कि मैं था, मैं स्वयं ही उसे महान दिव्य सत्ता में विलीन करने की चेष्टा करता हूँ। तुममें जो सत्य है, मुझमें जो सत्य है, वह ब्रह्म ही है। वत्स! उस ब्रह्म की ही पूजा करो! उसी की उपासना करो।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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