रविवार, 12 अगस्त 2018

👉 स्वाध्याय-सन्दोह

🔶 “जो ब्रह्मचारी बनने की कोशिश कर रहा है उसके लिये अनेक बन्धनों (नियमों) की जरूरत है। आम के छोटे पेड़ को सुरक्षित रखने के लिये उसके चारों तरफ बाड़ लगानी पड़ती है। छोटा बच्चा पहले माँ की गोद में सोता है, फिर पालने में और फिर चालन-गाड़ी लेकर चलता है। जब बड़ा होकर खुद चलने लगता है तब सब सहारा छोड़ देता है। ब्रह्मचर्य पर भी यही चीज लागू होती हैं। ब्रह्मचर्य एकादश व्रतों में से एक व्रत बतलाया गया है। इस पर से यह कहा जा सकता है कि ब्रह्मचर्य की मर्यादा या रक्षा करने वाली बाड़ एकादश व्रतों का पालन है। वास्तव में ब्रह्मचर्य मन की स्थिति है। बाहरी आचार या व्यवहार उसकी निशानी है।

🔷 जिस पुरुष के मन में जरा भी विषय-वासना नहीं रही है, वह कभी विकार के वश में नहीं होगा। वह किसी स्त्री को चाहे जिस हालत में देखे, चाहे जिस रूप-रंग में देखे, तो भी उसके मन में विकार उत्पन्न नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मचारी को अपनी मर्यादा स्वयं ही बना लेनी चाहिये। उद्देश्य यही है कि हम सच्चे ब्रह्मचर्य को पहिचानें, उसकी कीमत जान लें और ऐसे कीमती ब्रह्मचर्य का पालन करें।”

✍🏻 महात्मा गाँधी
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 अपने दोषों को भी देखा कीजिए! (भाग 2)

उसी बात को स्नेह और आत्मीयतापूर्वक कहें तो आपके संबंध भी अच्छे बने रहते हैं और आपकी बात भी मान ली जाती है। ऐसे समय किन्हीं व्यक्तियों या...