सोमवार, 20 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 20)

🌹 जीवन-साधना एवं ईश-उपासना  

🔵 आस्तिकता या आध्यात्मिकता का क्रियापक्ष भी अपने स्थान पर उचित है। उससे अभीष्ट प्रयोजन के सधने में सुविधा भी रहती है और सरलता भी होती है, पर किसी को यह अनुमान नहीं लगा लेना चाहिये, कि पूजा-कृत्यों की प्रक्रिया पूरी करने भर से आध्यात्मिकता के साथ जुड़ी रहने वाली फलश्रुतियों और विभूतियों की प्राप्ति भी हो जाती है। यह तो संकेत ‘सिम्बल’ मात्र है, जो दिशा-निर्धारण करता है और मील के पत्थर की तरह बताता है कि अपनी दिशाधारा किस ओर होनी चाहिये।        

🔴 साधना का प्रयोजन है- जीवन-साधना अर्थात् अपने साथ कड़ाई और दूसरों के साथ उदारता बरतना। कड़ाई का तात्पर्य है-संयम-अनुशासन का कठोरतापूर्वक परिपालन। इन्द्रिय-संयम अर्थ-संयम और विचार-संयम ही साधना के तीन चरण हैं। इन्हीं को तत्परता के नाम से जाना जाता है। इस प्रयोजन के लिये अपव्यय को कठोरतापूर्वक रोकना पड़ता है और जो समय, श्रम, चिंतन, साधन आदि बचाया जा सकता है, उसे तत्परतापूर्वक रोका जाता है और साथ ही इसका भी ध्यान रखना पड़ता है कि उसका सत्प्रयोजनों में श्रेष्ठतम सदुपयोग किस प्रकार बन पड़े? यदि यह निभ सके तो समझना चाहिये कि वास्तविक संयम-साधना की तपश्चर्या सही दिशा में रीति से चल रही है और उसका सदुपयोग भी उच्चस्तरीय प्रतिफल प्रदान करके रहेगा।        

🔵 पूजा-अर्चा प्रतीक मात्र है, जो बताती है कि वास्तविक उपासक का स्वरूप क्या होना चाहिये और उसके साथ क्या उद्देश्य और क्या उपक्रम जुड़ा रहना चाहिये। देवता के सम्मुख दीपक जलाने का तात्पर्य यहाँ दीपक की तरह जलने और सर्वसाधारण के लिये प्रकाश प्रदान करने की अवधारणा हृदयंगम कराना है। पुष्प चढ़ाने का तात्पर्य यह है कि जीवन क्रम को सर्वांग सुंदर, कोमल व सुशोभित रखने में कोई कमी न रखने दी जाए। अक्षत चढ़ाने का तात्पर्य है कि हमारे आय का एक नियमित अंशदान परमार्थ-प्रयोजन के लिये लगता रहेगा। चंदन-लेपन का तात्पर्य यह है कि संपर्क क्षेत्र में अपनी विशिष्टता सुगंध बनकर अधिक विकसित हो।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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🔷 एक बार एक महात्मा जी के दरबार मे एक राहगीर आया और उसने पुछा की हॆ महात्मन सद्गुरु की आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिये? 🔶 महात्मा जी ने...