सोमवार, 20 मार्च 2017

👉 सादगी के दो नमूने

🔴 अपने भू० पू० राष्ट्रपति-स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद जी का जीवन सादगी का जीता-जागता उदाहरण कहा जा सकता है। प्रस्तुत घटना सन १९३५ की है। राजेंद्र बाबू अगले होने वाले कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष थे। वे इलाहाबाद स्टेशन पर उतरे। किसी आवश्यक कार्य से आए थे। 'लीडर' अखबार में उन्हें अपना एक वक्तव्य भी देना था। उन दिनों उसके संपादक थे सी० वाई० चिंतामणि। अच्छा परिचय था उनसे राजेंद्र बाबू का। सोचा, क्यों न वक्तव्य स्वयं ही कार्यालय जाकर दे आऐ। सीधे चल पडे़ वह भी पैदल।

🔵 सर्दी के दिन थे। हल्की बूंदाबाँदी हो रही थी। पहुँचते-पहुँचते कपडे़ थोडे गीले हो गए।

🔴 जाकर चपरासी को अपना परिचय पत्र दिया। वह जाकर संपादक महोदय की टेबल पर रख दिया।

🔵 संपादक जी उस समय कुछ लिखने में व्यस्त थे, उसने बीच में बोलना उचित न समझा। बाहर आकर कह दिया कि-साहब अभी व्यस्त हैं। देर लगेगी।

🔴 थोडी देर प्रतीक्षा की, फिर उनकी दृष्टि सामने गई जहाँ कुछ चपरासी एक सिगडी के सहारे हाथ सेक रहे थे, बस फिर क्या था वे भी चले गए और अपने गीले कपडे़ सुखाने लगे।

🔵 थोडी देर बाद जब चिंतामणि जी ने दृष्टि उठाइ काम पर से, तब अनायास ही कार्ड दिखाई दे गया।

🔴 घंटी बजाई और चपरासी को बुलाकर पूछा कार्ड कौन लाया था ?'' चपरासी ने उत्तर दिया, "वह आदमी बाहर खडा है।" वे शीघ्रता से बाहर आए। पर वहाँ कोई न था, फिर चपरासी से पूछा- 'ये सज्जन कहाँ हैं ? तब चपरासी ने उधर की ओर इशारा कर दिया, जहाँ वे अपने गीले कपडे़ सुखा रहे थे। श्री चिंतामणि दौडकर उनके पास गये और क्षमा याचना की।

🔵 पर वहाँ कहाँ कोई बात थी उनके मन में। हँसकर कहने लगे मैंने सोचा इतनी देर में यही काम कर डालूँ। कपडे़ सुखाना भी तो जरूरी थे।

🔴 इसी प्रकार एक बार विश्व-विख्यात वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ श्री आइंस्टीन, बेलजियम की महारानी के निमंत्रण पर उनके यहाँ जा रहे थे, महारानी ने अपने यहाँ के उच्च अधिकारियों को लेने स्टेशन भेजा, कितु उनकी वेशभूषा इतनी साधारण थी कि उनमें से कोई भी उन्हें पहचान न सका। महान् मनीषी कहाँ इस बात की परवाह करते हैं कि लिबास या रहन-सहन के उपकरण भड़कीले तथा आकर्षक हैं या नहीं, बल्कि उन्हें वे अनुपयोगी तथा अनावश्यक ही मानते हैं। ''सादा जीवन-उच्च विचार'' ही उनका जीवन आदर्श होता है।

🔵 अधिकारीगण निराश होकर लौट गए। इधर विज्ञानाचार्य महोदय उतरे और अपना बैग लिए हुए महल के द्वार पर जा पहुँचे। महारानी समझ रही थीं कि वे आए ही नही। इस प्रकार उनके पहुँचने पर उन्होंने बडा खेद प्रगट किया और कहा- "आपको पैदल ही आना पडा। इसका मुझे बहुत ही दुःख है।" किंतु आइंस्टीन महोदय मुस्कराते हुये कहने लगे- 'आप इस जरा-सी बात के लिए दुःख न करें, मुझे चलना बहुत अच्छा लगता है।"

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 93, 94

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