सोमवार, 23 मार्च 2020

👉 अहंकार

अहंकार विवेक का हरण कर लेता है। इसके चलते सही सोच-समझ और सम्यक् जीवन दृष्टि समाप्त हो जाती है। इसकी पीड़ा से किसी न किसी तरह हर कोई पीड़ित है। फिर भी इसे विडम्बना ही कहेंगे कि आधुनिक मनोविज्ञान और आधुनिक शिक्षा की पूरी धारणा यह है कि जब तक व्यक्ति के पास मजबूत अहंकार न हो, तब तक वह जीवन में संघर्ष न कर पायेगा। यही वजह है कि समाज की पूरी विधि-व्यवस्था और सारे शिक्षण संस्थान आक्रामक एवं अहंकारी व्यक्तित्व गढ़ने में लगे हैं।
  
बचपन से ही बच्चे को सिखाया जाता है, तुम्हें अपनी कक्षा में प्रथम आना है। जब वह बच्चा किसी तरह से कक्षा में प्रथम आ जाता है तो हर कोई उसकी प्रशंसा करना शुरू कर देता है। फिर वह भले ही जिन्दगी की सही-सोच-समझ से कितना ही वंचित क्यों न हो? बड़े होने के साथ उसमें अहंकार का रोग बढ़ता जाता है और विवेक कम होता जाता है। इस बारे में जिधर भी आँख उठा कर देखा जाता है, स्थिति एक जैसी ही मिलती है।
  
अहंकार के रोग की खास बात यह है कि यदि व्यक्ति सफल होता जाता है तो उसका अहंकार भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है और वह एक विशाल चट्टान की भाँति जीवन के सुपथ, सत्पथ या आध्यात्मिक पथ को रोक लेता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति असफल हुआ तो उसका अहंकार एक घाव की भाँति रिसने व दुखने लगता है। धीरे-धीरे मन में हीनता की ग्रन्थि बन जाती है, जो सदा-सर्वदा डराती रहती है।
  
सद्विवेक-सद्ज्ञान ही इस अहंकार के रोग की औषधि व उपचार है। सद्विवेक-उद्देश्य व औचित्य के अनुरूप निरन्तर कार्यरत रहने, संघर्षशील होने की प्रेरणा देता है। कार्य की सफलता या विफलता इसे प्रभावित नहीं करती। इसके पहले शान्ति और पीछे आशीर्वाद उमड़ता रहता है। जहाँ कठिन संघर्षों में भी शांति व आशीर्वाद सघन है, समझो वहाँ अहंकार का नामोनिशान नहीं केवल सद्विवेक है।  

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०७

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