गुरुवार, 26 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 20) 27 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना

🔴 प्रज्ञायोग एक ऐसी ही विधा है। इसे बोलचाल की भाषा में जीवन साधना भी कहा जा सकता है। इसमें जप, ध्यान, प्राणायाम, संयम जैसे विधानों की व्यवस्था है। पर सब कुछ उतने तक ही सीमित नहीं है। उपासना में ध्यान धारणा स्तर के सभी कर्मकाण्ड आ जाते हैं। इसके साथ ही जीवन के हर क्षेत्र में मानवी गरिमा को उभारने और रुकावटें हटाने जैसे सभी पक्षों को जोड़कर रखा गया है। शरीरसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम, विचारसंयम इस धारा के अलग न हो सकने वाले अंग हैं।               

🔵 दुर्गुणों के, कुसंस्कारों के निराकरण पर जहाँ जोर दिया गया है, वहाँ यह भी अनिवार्य माना गया है कि अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक विवेकवान, चरित्रवान और पुरुषार्थ परायण बनने के लिये चिन्तन तथा अभ्यास जारी रखा जाये। वास्तव में यह समग्रता ही जीवन साधना की विशेषता है। साधक को कर्तव्य क्षेत्र में धार्मिकता, मान्यता क्षेत्र में आत्मपरायणता और अध्यात्म क्षेत्र में दूरदर्शी विवेकशीलता उत्कृष्ट आदर्शवाद को अपनाने के लिये कहा जाता है। इन सर्वतोमुखी दिशाधाराओं में समुचित जागरूकता बरतने पर ही वह लाभ मिलता है, जिसे आत्म परिष्कार के नाम से जाना जाता है। यह हर किसी के लिये सरल, सम्भव और स्वाभाविक भी है। 

🔴 आत्मपरिष्कार के अन्य उपाय भी हो सकते हैं। पर जहाँ तक प्रज्ञा परिवार के प्रयोगों का सम्बन्ध है, वहाँ यह कहा जा सकता है कि वह अपेक्षाकृत अधिक सरल, तर्कसंगत और व्यवस्थित हैं। इस सन्दर्भ में अनेक अभ्यासरत अनुभवियों की साक्षी भी सम्मिलित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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