गुरुवार, 26 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 35)

🌞  हिमालय में प्रवेश

बादलों तक जा पहुंचे

🔵 आज प्रातःकाल से ही वर्षा होती रही। यों तो पहाड़ों की चोटी पर फिरते हुए बादल रोज ही दीखते पर आज तो वे बहुत ही नीचे उतर आये थे। जिस घाटी को पार किया गया वह भी समुद्र तल से 10 हजार फुट की ऊंचाई पर थी। बादलों को अपने ऊपर आक्रमण करते, अपने को बादल चीर कर पार होते देखने का दृश्य मनोरंजक भी था और कौतूहल वर्धक भी। धुनी हुई रुई के बड़े पर्वत की तरह भाप से बने ये उड़ते हुए बादल निर्भय होकर अपने पास चले आते। घने कुहरे की तरह चारों ओर एक सफेद अंधेरा अपने चारों ओर फिर जाता। कपड़ों में नमी आ जाती और शरीर भी गीला हो जाता। जब वर्षा होती तो पास में ही दीखता कि किस प्रकार रुई का बादल गल कर पानी की बूंदों में परिणित होता जा रहा है।

🔴 अपने घर गांव में जब हम बादलों को देखा करते थे तब वे बहुत ऊंचे लगते थे, नानी कहा करती थी कि जहां बादल हैं वहीं देवताओं का लोक है। यह बादल देवताओं की सवारी हैं इन्हीं पर चढ़ कर वे इधर उधर घूमा करते हैं और जहां चाहते हैं पानी बरसाते हैं। बचपन में कल्पना किया करता था कि काश मुझे भी एक बादल चढ़ने को मिल जाता तो कैसा मजा आता, उस पर चढ़ कर चाहे जहां घूमने निकल जाता। उन दिनों मेरी दृष्टि में बादल की कीमत बहुत थी। हवाई जहाज से भी अनेक गुनी अधिक। जहाज चलाने को तो उसे खरीदना, चलाना, तेल जुटाना सभी कार्य बहुत ही कठिन थे पर बादल के बारे में तो कुछ करना ही न था, वैसे कि चाहे जहां चल दिये।

🔵 आज बचपन की कल्पनाओं के समन बादलों पर बैठ कर उड़े तो नहीं पर उन्हें अपने साथ उड़ते तथा चलते देखा तो प्रसन्नता बहुत हुई। हम इतने ऊंचे चढ़े कि बादल हमारे पांवों को छूने लगे। सोचता हूं बड़े कठिन लक्ष जो बहुत ऊंचे और दूर मालूम पड़ते हैं, मनुष्य इसी तरह प्राप्त कर लेता होगा, पर्वत चढ़ने की कोशिश की तो बादल की बराबर पहुंच गया। कर्त्तव्य कर्म का हिमालय भी इतना ही ऊंचा है। यदि हम उस पर चढ़ते ही चलें तो साधारण भूमिका से विचरण करने वाले शिश्नोदर परायण लोगों की अपेक्षा वैसे ही अधिक ऊंचे उठ सकते हैं जैसे कि निरन्तर चढ़ते-चढ़ते दस हजार फुट की ऊंचाई पर आ गये।

🔴 बादलों को छूना कठिन है। पर पर्वत के उच्च शिखर के तो वह समीप ही होता है। कर्त्तव्य परायणता की ऊंची मात्रा हमें बादलों जितना ऊंचा उठा सकती है और जिन बादलों तक पहुंचना कठिन लगता है वे स्वयं ही खिंचते हुए हमारे पास चले आते हैं। ऊंचा उठाने की प्रवृत्ति हमें बादलों तक पहुंचा देती है, उन्हें हमारे समीप तक स्वयं उड़कर आने के लिए विवश कर देती है। बादलों को छूते समय ऐसी-ऐसी भावनाएं उनसे उठती रहें। पर बेचारी भावनाएं अकेली क्या करें। सक्रियता का बाना उन्हें पहनने को न मिले तो वे एक मानस तरंग मात्र ही रह जाती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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