बुधवार, 6 जून 2018

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 1)

🔶 यह बात नितान्त सत्य है कि किसी मृतक व्यक्ति का सम्बन्धी मृतक भोज खुशी से नहीं देता। वह इस अनुचित एवं अपव्ययी दण्ड को मजबूरन सहन करता है—क्योंकि समाज में इसकी प्रथा चल रही है और वह एक सामाजिक व्यक्ति है, समाज की रीति-नीतियों का उल्लंघन कर सकना उसके वश की बात नहीं है।

🔷 किसी अमीर आदमी की बात तो छोड़ दीजिए। वह अपने मरों के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं, बांट सकते हैं, लुटा सकते हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। ‘‘समरथ को नहीं नहीं दोष गुसाईं’’ के अनुसार उन्हें तो कोई भी प्रदर्शन एवं शोन-शेखी जेवा देती है। प्रश्न उन साधारण व्यक्तियों का है जो दोनों छाक अपने बच्चों के लिये भोजन भी कठिनता से जुटा पाते हैं और जिनकी संख्या समाज में अस्सी-नब्बे प्रतिशत से कम नहीं होती। इस प्रकार की आर्थिक आत्म–हत्या का प्रश्न उन्हीं सामान्य लोगों के लिये ही है।
समाज में जब तक मृतक-भोज जैसी विनाश कारी प्रथा प्रचलित ही है तब उसको किस प्रकार रोका जाये—इस पर विचार करने से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मृतक-भोज खाने वालों को ही इसका प्रचलन रोकने के लिये उदारतापूर्वक तत्पर होना चाहिये।

🔶 जब किसी का कोई स्वजन मर जाता है तब सामाजिक नियम उसे मृतक भोज देने के लिए तकाजा करता है। इस तकाजे में परोक्ष रूप से उस जातीय बहुमत का दबाव रहता है जो उसके यहां खाने के लिए जाने वाला होता है। यद्यपि यह बहुमत मृतक व्यक्ति के घर जाकर उसके सम्बन्धी से सीधे-साधे भोज की मांग नहीं करता तब भी उसकी यह मांग जातीय बहिष्कार के रूप में नग्न हो उठती है जब कोई आर्थिक कठिनाइयों के कारण मृतक भोज नहीं दे पाता अथवा देने में आना-कानी करता है। इस प्रकार यह दबाव खाने वालों की ओर से ही पड़ा करता है। यदि भोजन का लोभ छोड़ कर जातीय बन्धु थोड़ी उदारतापूर्वक काम लें तो यह समस्या सहज ही हल हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 82

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...