रविवार, 14 मई 2017

👉 गीत तो बहुत गा लिए - अब गीता गाएँ

🔵 गीत हमें अच्छे लगते हैं। अपनी मनःस्थिति के अनुकूल गीत गाते रहते हैं। कहते हैं गीत गाने से मन हलका होता है। चित्त शान्त होता है, उत्साह बढ़ता है। लेकिन गीत तो बहुत गा लिए। गीतों के साथ संगति देने वाले, स्वर में स्वर मिलाने वाले भी मिल गए, पर कुछ हुआ नहीं। मन भारी का भारी, चित्त चंचल-अशान्त, उत्साह शिथिल और इन सबके कारण वही दुर्गति....न ऊपर उठे, न आगे बढ़े। संतुलन की स्थिति चित्त को न मिली, उत्साह न आ सका। किसी ने कहा, प्रभु को पुकारो, अपनी शक्ति काम नहीं करती, तो उसे बुलाओ। प्रभु हमारी पुकार सुनेंगे, तो उबार लेंगे। हम भक्ति के गीत गाने लगे-पर विश्वास हिल उठा, गला बैठने लगा, लेकिन स्थिति बदली नहीं। आखिर क्यों? क्या वह सुनता नहीं....?

🔴 अरे नहीं, वह सुनता है और देखता भी है। हम ही हैं अभागे, जो देखते भी नहीं और सुनते भी नहीं। अपने गीत गाने में इतने खो गए हैं कि उसकी गीता के स्वर सुनाई ही नहीं देते। कानों पर से हाथ हटाएँ, कोलाहल के बीच उभरती हुई उसकी वाणी सुनें.....। वह तो उद्बोधन के लिए सदा तैयार है.. ही ‘‘करिष्ये वचनं तव’’ का भाव नहीं उभरता।
  
🔵 अब अपनी अलापना बन्द करें, उसकी सुनें। गाना है तो हम भी गीता ही गाएँ। लेकिन गीता भला कैसे गाएँ, वह तो भगवान् गाते हैं। हम तो उसकी सुनें। गीता के स्वर वही जानता है, पर स्वर-में-स्वर हम भी मिला सकते हैं। गीता वह अपने लिए थोड़े ही गाता है? हम सबमें प्राण संचार के लिए गाता है, गति देने के लिए गाता है। उन स्वरों को सुनें, अंतर में झंकृत होने दें। फिर अपने आप एक सिहरन उठेगी, होंठ फड़केंगे, पाँव थिरकेंगे। यह कोई सामान्य गीत नहीं, यह तो अभियान गीत है। उस पर तबले की नहीं, कदमों की ताल दी जाती है। संगति के लिए अलाप नहीं, क्रियाकलाप सँभालने पड़ते हैं।

🔴 गीता वह अकेले नहीं गाता, बहुतों को साथ लेकर गाता है। उसका साथ देना, जो सीख ले, वही संगति दे पाता है। उसका ढंग ही कुछ निराला है। अर्जुन ने संगति दी-तानपूरे का तार चढ़ाकर नहीं-गाण्डीव की प्रत्यंचा से, गुरुगोविंदसिंह ने मँजीरे नहीं तलवारें खनखनायी। उसकी संगति में विवेकानन्द ने स्वर अलापा और विनोबा के पग थिरके। हर युग में उसकी गति के अलग ढंग बनते हैं। ‘‘करिष्ये वचनं तव’’ का संकल्प जगते ही उसका ढंग अपने आप समझ में आ जाता है।

🔵 पर हम गीता गाना कहाँ चाहते हैं? वह गीता कहाँ सुनना चाहते हैं, जिससे जीवन फड़क उठे और धन्य हो जाए। लेकिन जिस आनन्द की लहरें उठाने के लिए हम गीत गाने का असफल प्रयोग करते रहे हैं, वह तो गीता गाने से मिलेगा। आओ इसी क्षण अपने गीत की सीमा से आगे बढ़ें, उसकी गीता गाएँ।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 69

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 1)

देवियो! भाइयो!! 🔴 आप में से अधिकांश व्यक्ति सोच रहे होंगे कि मैं यहाँ था, परन्तु व्याख्यान क्यों नहीं दिया? विशेष कारणवश व्याख्यान न दे...