शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 21)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 भौतिक क्षेत्र की त्रिविध सम्पदाओं को प्रगति का माध्यम कहा गया है। समृद्धि, समर्थता और कुशलता के आधार पर व्यक्ति या समाज के सौभाग्य को सहारा जाता है। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है, बशर्ते कि उन पर नैतिकता, सामाजिकता और सद्भावना का अंकुश ढीला न होने पाए। व्यक्ति कमाये कुछ भी, पर ध्यान इतना अवश्य रखें कि उसमें अनीति का, मुफ्तखोरी का समावेश तो नहीं, हो रहा है? उस उपार्जन को भी निजी स्वामित्व के अन्तर्गत ही समझ लिया जाये। ध्यान इस बात का भी रखा जाये कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसकी आद्योपान्त प्रगति जन सहयोग के आधार पर ही सम्भव हुई है।

🔴 जिससे पाया है, उसे चुकाया भी जाना चाहिए अन्यथा लुटेरेपन की ही तूती बोलने लगेगी। तब ऋण चुकाने, प्रत्युपकार करने या कृतज्ञता जताने का द्वार ही बन्द हो जायेगा। ऐसी दशा में संसार में दो ही वर्ग शेष रहेंगे-एक शोषक, दूसरा शोषित। तब उन स्थापनाओं और विधाओं के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जायेगा, जिनमें सहकारिता, सहभागिता और समानता का संस्थापना पर जोर दिया गया है। 

🔵 यदि जीवन में भाव संवेदना एवं वैचारिक उदारता के लिए स्थान न रह गया, तो वह अराजकता ही दीख पड़ने लगेगी, जिसमें समर्थों के लिए पीसना और असमर्थों के लिए पिसना ही नियति है। ऐसा मत्स्य न्याय ही यदि मनुष्यों के लिए भी परम्परा बन जाये फिर उस श्रेष्ठता के लिए कोई गुञ्जाइश ही न रहेगी, जिसके कारण मनुष्य को देवत्व का उत्तराधिकारी माना गया है। ‘‘कमाने वाला ही खाये’’ की नीति को यदि मान्यता मिल गई तो संसार में अबोधों अविकसितों, अपंगो, असमर्थों को जीवित रहने का कोई अधिकार ही न रह जायेगा।

🔴 उस स्थिति में अर्थ शास्त्र के अनुसार मनुष्यों में से प्राय: आधों को अपने जीवन का अन्त करना होगा। तब बूढ़ों को जीवित रहने देने की हिमायत किस तर्क के आधार पर की जा सकेगी? तब फिर इस संसार में भेड़ियों को भेड़ियों द्वारा ही फाड़ चीर कर खा जाने जैसे दृश्य सर्वत्र उपस्थित होंगे। तब कैसा वीभत्स होगा संसार?     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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