शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 41)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ     
🔴 अन्य कुटीर उद्योग भी इसी श्रेणी में आते हैं। बेरोजगारी दूर करने के साधन खड़े करें प्रकारान्तर से अभावग्रस्तों की सहायता की है। मुफ्तखोरी का बढ़ावा देना दान नहीं है। इससे निठल्लेपन की आदत पड़ती है। प्रमाद और व्यसन पनपते हैं। लेने वाले को हीनता की अनुभूति होती है और देने वाले का अहंकार बढ़ता है। यह दोनों ही प्रवृत्तियाँ दोनों ही पक्षों के लिये अहितकर हैं इसलिये औचित्य और सही परिणाम को दृष्टि में रखते हुए दान किया जाना चाहिये। अन्यथा दान के नाम पर धन का दुरुपयोग ही होता है और उससे स्वावलम्बन का उत्साह घटता है। 

🔵 दोनों में सर्वोपरि ज्ञान दान को माना जाता है। इसे ब्रह्मयज्ञ भी कहते हैं। सद्भावनायें और सत्प्रवृत्तियाँ जिन प्रयत्नों से बढ़ सकें उसी को सच्चा परमार्थ कहना चाहिये। सत् चिन्तन के अभाव में ही लोग अनेकों दुर्गुण अपनाते और पतन-पराभव के गर्त में गिरते हैं। यदि सही चिन्तन कर सकने का पथ प्रशस्त हो सके तो समझना चाहिये कि सर्व-समर्थ मनुष्य को अपनी समस्यायें आप हल करने का मार्ग मिल गया। अपंगों, असमर्थों या दुर्घटनाग्रस्तों को छोड़कर कोई ऐसा नहीं है जो सही चिन्तन करने का मार्ग मिल जाने पर ऊँचा उठ न सकें, आगे न बढ़ सकें, अपनी समस्याओं को आप हल न कर सकें। इसलिये आत्मिक प्रगति के लिये प्रधानता यही नीति अपनानी चाहिये कि लोकमानस के परिष्कार के लिये, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिये अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार भरसक प्रयत्न किया जाये।        
                      
🔴 समय की अपनी समस्यायें हुआ करती हैं और परिस्थितियों के अनुरूप उनके समाधान भी खोजने पड़ते हैं। प्राचीन कथा, पुराणों और धर्मशास्त्रों से युगधर्म का निरूपण नहीं हो सकता उसके लिये आज के प्रवाह प्रचलन और वातावरण को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु युग मनीषियों को ही सदा से मान्यता मिलती रही है। इन दिनों भी इसी प्रक्रिया को अपनाना होगा। इसके लिये युग चेतना का आश्रय लेना होगा। युग मनीषियों के प्रतिपादनों पर ध्यान देना होगा। सद्ज्ञान संवर्द्धन का सही तरीका यही हो सकता है। साक्षरता की तरह ऐसे सद्ज्ञान संवर्द्धन की भी आवश्यकता है जो व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थित समस्याओं के सन्दर्भ में समाधान-कारक सिद्ध हो सकें। आत्मोत्कर्ष के लिये आराधना का सेवा साधना का उपाय इसी आधार पर खोजना होगा। लोकमानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन को सर्वोच्च स्तर का आधार मानते हुए बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में युगधर्म की प्रतिष्ठापना की जानी चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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