रविवार, 13 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 107)

👉 ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूप में गुरूगीता
🔶 गुरूगीता के इस विस्मयकारी सुफल को भगवान् सदाशिव कहते हैं-

कालमृत्युभयहरं सर्वसंकटनाशनम् ।। यक्षराक्षसभूतानां चौरव्याघ्रभयापहम्॥ १३५॥
महाव्याधिहरं सर्व विभूतिसिद्धिदं भवेत्। अथवा मोहनं वश्यं स्वयमेवं जपेत्सदा॥ १३६॥

🔷 गुरूगीता का जप काल एवं मृत्यु के भय का हरण करने वाला है। इससे सभी संकटों का नाश होता है। इतना ही नहीं, इससे यक्ष, राक्षस, भूत, चोर एवं व्याघ्र आदि के भय का भी हरण होता है॥ १३५॥ इसके जप से सभी व्याधियाँ दूर होती हैं। सभी सिद्धियों एवं अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति होती हैं। यहाँ तक कि इस गीता को स्वयं जपने से सम्मोहन वशीकरण आदि की शक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है॥ १३६॥

🔶 गुरूगीता के दार्शनिक रहस्य, यौगिक रहस्य तो अद्भुत हैं ही इसके काम्य प्रयोग भी विलक्षण हैं। जिनका मूल स्त्रोत है, शिष्य की श्रद्धा, आस्था और उपयुक्त विधि- विधान। शिष्य की श्रद्धा एवं उपयुक्त विधियाँ गुरूगीता के मंत्रों को महासमर्थ बनाती हैं। हालाँकि इसके प्रयोगकर्त्ता विरले एवं विलक्षण ही मिलते हैं। फिर भी इनका सम्पूर्ण अभाव नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 162

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ७)

पिता के प्रति पुत्र के तीन कर्त्तव्य हैं - 1-स्नेह, 2-सम्मान तथा आज्ञा पालन। जिस युवक ने पिता का, प्रत्येक बुजुर्ग का आदर करना सीखा है, ...