गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 99)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 जातियों-संगठनों के वर्तमान स्वरूप और जाति-पांति से उत्पन्न होने वाली बुराइयों को ध्यान में रखते हुए तत्काल तो कोई भी विचारशील व्यक्ति इस प्रकार के प्रयत्नों का विरोध नहीं करेगा। जब उसे हमारे प्रयोजन का पता चलेगा और वस्तु स्थिति पर विचार करेगा तो उसे इसकी सामयिक उपयोगिता एवं आवश्यकता का महत्व भी स्वीकार करना पड़ेगा। कुएं में गिरना एक बात है और कुएं में गिरे हुये को निकालने के लिये कुएं में घुसना दूसरी बात है। जाति वाद की संकीर्णता से लड़ने के लिये और उस बुराई का उन्मूलन करने के लिये बनाये गये जातीय संगठन लहर एक जैसे दीख पड़ सकते हैं, पर वस्तुतः उनमें कुएं में गिरने वाले और निकालने के लिये उतरने वाले की तरह जमीन-आसमान का अन्तर है। हम संकीर्णता फैलाने के लिये नहीं वरन् उसके उन्मूलन के लिये जातीय संगठन बना रहे हैं। अस्तु इसका परिणाम भी हमारी भावना के अनुरूप ही होगा।

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार के लिये लोग अपने जातीय संगठन बनाने और उनके द्वारा आदर्श विचारों का प्रयोजन पूरा करने का प्रयत्न करें। इन संगठनों को अधिक सहायक बनाकर हम सामाजिक क्रान्ति की एक भारी आवश्यकता को पूरा भी कर सकते हैं।

🔴 1. संगठनों का नामकरण:-- इन जातीय संगठनों का निर्माण प्रगतिशीलता बढ़ाने के लिये किया जा रहा है। आज जातिवाद जिन कारणों से बदनाम है, उन्हें हटाना अपना उद्देश्य है। संकीर्णता, वंशगत अहंकार, अपनी जाति वालों के साथ पक्षपात, अपने वर्ग में प्रचलित रूढ़ियों का अन्ध-समर्थन जैसे कारणों से जातिवाद बदनाम हुआ है। हमें इन बातों से तनिक भी लगाव नहीं, अपना उद्देश्य तो जिस क्षेत्र में अपना अधिक परिचय, अधिक प्रभाव एवं अधिक सम्बन्ध रहता है, उसे अधिक सुविकसित, सुसंस्कृत एवं प्रगतिशील बनाना है। इसलिये अपने द्वारा संगठित सभाओं के साथ अनिवार्यतः ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा रहना चाहिये। ताकि अपने उद्देश्यों की प्राथमिकता और पुराने ढंग की जातीय सभाओं से अपनी भिन्नता सिद्ध कर सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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