गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 47)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 लगा कि वह जल धारा कमल पुष्प सी सुन्दर एक देव कन्या के रूप में परिणित होती है। वह अलौकिक शांति, समुद्र सी सौम्य मुद्रा में ऐसी लगती थी मानो इस पृथ्वी की सारी पवित्रता एकत्रित होकर मानुषी शरीर में अवतरित हो रही हो। वह रुकी नहीं, समीप ही उस शिलाखण्ड पर आकर विराजमान हो गई। लगा—मानो जागृत अवस्था में ही यह सब देखा जा रहा हो।

🔴 उस देव कन्या ने धीरे-धीरे अत्यन्त शांत भाव से मुधर वाणी में कुछ कहना आरम्भ किया। मैं मन्त्र मोहित की तरह एकचित्त होकर सुनने लगा। वह बोली—नर तनु धारी आत्मा, तू अपने को इन निर्जन वन में अकेला मन मान। दृष्टि पसार कर देख चारों ओर तू ही बिखरा पड़ा है। मनुष्य तक अपने को सीमित मत मान। इस विशाल सृष्टि में मनुष्य भी एक छोटा-सा प्राणी है। उसका भी एक स्थान है, पर सब कुछ वही नहीं है। जहां मनुष्य नहीं वहां सूना है ऐसा क्यों माना जाय? अन्य जड़ चेतन माने जाने वाले जीव भी विश्वात्मा के वैसे ही प्रिय पुत्र हैं जैसा मनुष्य। तू उन्हें क्यों अपना सहोदर नहीं मानता? उनमें क्यों अपनी आत्मा नहीं देखता? उन्हें क्यों अपना सहचर नहीं समझता? इस निर्जन में मनुष्य नहीं है, पर अन्य अगणित जीवधारी मौजूद हैं। पशु-पक्षियों की, कीट-पतंगों की, वृक्ष वनस्पतियों की, अनेक योनियां इस गिरि कानन में निवास करती हैं। सभी में आत्मा है, सभी में भावना है। यदि तू इन अचेतन समझे जाने वाले चेतनों की आत्मा से अपनी आत्मा को मिला सके तो ए पथिक! तू अपनी खंड-आत्मा को समग्र-आत्मा के रूप में देख सकेगा।’’

🔵 धरती पर अवतरित हुई वह दिव्य सौंदर्य की अद्भुत प्रतिमा देव कन्या बिना रुके कहती ही जा रही थी—‘‘मनुष्य को भगवान् ने बुद्धि दी, पर वह अभागा उसका सुख कहां ले सका? तृष्णा और वासना में उसने इस दैवी वरदान का दुरुपयोग किया और जो आनन्द मिल सकता था उससे वंचित हो गया। वह प्रशंसा के योग्य प्राणी, करुणा का पात्र है। पर सृष्टि के अन्य जीव इस प्रकार की मूर्खता नहीं करते। उनमें चेतन की मात्रा न्यून भले ही हो पर भावना को उनकी भावना के साथ मिला कर तो देख। अकेलापन कहां-कहां है, सभी ही तेरे सहचर हैं। सभी तो तेरे बन्धु-बान्धव हैं।’’

🔴 करवट बदलते ही नींद की झपकी खुल गई। हड़बड़ा कर उठ बैठा। चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो वह अमृत-सा सुन्दर सन्देश सुनाने वाली देव कन्या वहां न थी। लगा मानों वह इसी सरिता में समा गई हो। मानुषी रूप छोड़कर जलधारा में परिणत हो गई हो। वे मनुष्य की भाषा में कहे गये शब्द सुनाई नहीं पड़ते थे, पर हर-हर कल-कल की ध्वनि में भाव वे ही गूंज रहे थे, संदेश वही मौजूद था। ये चमड़े वाले कान उसे सुन तो नहीं पा रहे थे पर कानों की आत्मा उसे अब भी समझ रही थी, ग्रहण कर रही थी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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