गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 जडे़ कमजोर थी

🔴 एक रात भयंकर तूफान आया। सैकड़ों विशालकाय वृक्ष धराशायी हो गये। अनेक किशोर वृक्ष भी थे जो बच तो गये थे, पर बुरी तरह सकपकाये खड़े थे।

🔵 प्रात:काल आया, सूर्य ने अपनी रश्मियाँ धरती पर फेंकी। डरे हुए पौधों को देखकर किरणों ने पूछा- 'बालको। तुम इतना सहमे हुए क्यों हो। ' किशोर पौधों ने कहा- देवियो! ऊपर देखो हमारे कितने पुरखे धराशायी पड़े हैं। रात के तूफान ने उन्हें उखाड़ फेंका। न जाने कब यही स्थिति हमारी भी आ बने।

🔴 किरणें हँसी और बच्चों से बोली- तात! आओ इधर देखो- यह वृक्ष तूफान के कारण नहीं जड़ें खोखली हो जाने के कारण गिरे, तुम अपनी जड़ें मजबूत रखना, तूफान तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं पायेंगे।

🔵 मनुष्यों का दीन- हीन होना विचित्र बात है। जब बिना साधनों के जंगल के जानवर स्वस्थ, निरोग और आमोद- प्रमोद का जीवन जी लेते हैं तो मनुष्य दु:खों का रोना क्यों रोये। स्पष्ट है उसकी तृष्णा, वासनायें और अहंता ही उसे श्मशान के भूत की तरह सताती रहती हैं। यदि व्यक्ति अपने दायरे को संकीर्ण न बनाता, इन तृष्णाओं के चंगुल में न फँसता तो दीन- दु:खी जीवन जीने की नौबत ही क्यों आती?

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 13

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