रविवार, 19 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 57)

🔵 देर बहुत हो गई थी। कुटी पर लौटते-लौटते अंधेरा हो गया। उस अंधेरे में बहुत रात गये तक सोचता रहा कि—मनुष्य की ही भलाई की, उसी की सेवा की, उसी के सान्निध्य की, उसी की उन्नति की, बात जो हम सोचते रहते हैं क्या इसमें जातिगत पक्षपात भरा नहीं है, क्या यह संकुचित दृष्टिकोण नहीं है? सद्गुणों की अपेक्षा से ही मनुष्य को श्रेष्ठ माना जा सकता है, अन्यथा वह अन्य जीवधारियों की तुलना में अधिक दुष्ट ही है। हमारा दृष्टिकोण मनुष्य की समस्याओं तक ही क्यों सीमित रहे? हमारा विवेक मनुष्येत्तर प्राणियों के साथ आत्मीयता बढ़ाने, उनके सुख-दुख में सम्मिलित होने के लिए अग्रसर क्यों न हो? हम अपने को मानव समाज की अपेक्षा विश्व समाज का एक सदस्य क्यों न मानें?

🔴 इन्हीं विचारों में रात बहुत बीत गई। विचारों के तीव्र दबाव में नींद बार-बार लगती-खुलती रही। सपने बहुत दीखे। हर स्वप्न में विभिन्न जीव-जन्तुओं के साथ क्रीड़ा, विनोद, स्नेह संलाप करने के दृश्य दिखाई देते रहे। उन सबके निष्कर्ष यही थे कि अपनी चेतना विभिन्न प्राणियों के साथ स्वजन सम्बन्धियों जैसी घनिष्ठता अनुभव कर रही है। आज के सपने बड़े ही आनन्ददायक थे। लगता रहा जैसे एक छोटे क्षेत्र से आगे बढ़कर आत्मा विशाल विस्तृत क्षेत्र को अपना क्रीड़ांगन बनाने के लिये अग्रसर हो रही है।

🔵 कुछ दिन पहले इस प्रदेश का सुनसान अखरता था पर अब तो सुनसान जैसी कोई जगह दिखाई ही नहीं पड़ती। सभी जगह तो विनोद करने वाले सहचर मौजूद हैं। वे मनुष्य की तरह भले ही न बोलते हों, उनकी परम्पराएं मानव समाज जैसी भले ही न हों पर इन सहचरों की भावनाएं मनुष्य की अपेक्षा हर दृष्टि से उत्कृष्ट ही है। ऐसे क्षेत्र में रहते हुए जी ऊबने का अब कोई कारण प्रतीत नहीं होता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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