शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 8

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 जिस प्रकार सर्वसाधारण को अपने रक्त सम्बन्धित परिवार को सुविकसित करने की जिम्मेदारी उठाने पड़ती है, उसी प्रकार हम अपने, इन तीस हजार कुटुम्बियों को लेकर जीवन-निर्माण कार्य में अवतीर्ण हो रहे हैं। उन्हें सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा तो बहुत पहले से दे रहे थे पर अब उनके सामने शत-सूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत करके आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता को जीवन व्यवहार में समन्वित करने का अभ्यास करा रहे हैं। यों इन कार्यक्रमों को लाखों व्यक्तियों द्वारा अपनाये जाने पर इनका प्रभाव समाज के नव-निर्माण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण दूरवर्ती एवं चिरस्थायी होगा।

🔴 बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति की महान आवश्यकता की वह चिनगारी जलेगी जो आगे चलकर पाप-तापों का भस्मसात करने में दावानल का रूप धारण कर सके। साथ ही इसमें आत्म-कल्याण एवं जीवन-मुक्ति का उद्देश्य भी सन्निहित है। यह योजना व्यक्ति को निकृष्ट स्तर का जीवनयापन करने की दुर्दशा से ऊंचा उठा कर उत्कृष्टता अपनाने की आध्यात्मिक साधना का अवसर उपस्थित करती है। इसलिए उसे एक प्रकार की योग साधना, तपश्चर्या, नर-नारायण की भक्ति तथा भावोपासना भी कह सकते हैं।

🔵 इस मार्ग पर चलते हुए—शत-सूत्री कार्यक्रमों में से जिसे जितने अनुकूल पड़े, उन्हें अपनाते हुए निश्चित रूप से साहस एवं मनस्विता का परिचय देना पड़ेगा। कई व्यक्ति उपहास एवं विरोध करेंगे। स्वार्थों को भी सीमित एवं संयमित करना पड़ेगा। आर्थिक दृष्टि से थोड़ा घाटा भी रह सकता है और अपने पूर्व संचित कुसंस्कारों से लड़ने में कठिनाई भी दृष्टिगोचर हो सकती है।

🔴 जो इतना साहस कर सकेगा उसे सच्चे अर्थों में साधना समर का शूरवीर योद्धा कहा जा सकेगा। यह साहस ही इस बात की कसौटी मानी जायगी कि किसी व्यक्ति ने आध्यात्मिक विचारों को हृदयंगम किया है, या केवल सुना समझा भर है। योजना एक विशुद्ध साधना है जो युग-निर्माण का—समाज की अभिनव रचना का उद्देश्य पूरा करते हुए व्यक्ति को उसका जीवन लक्ष्य पूरा कराने में किसी भी अन्य जप-तप वाली साधना की अपेक्षा अधिक सरलता से पूर्णता के लक्ष्य तक पहुंचा सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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