मंगलवार, 8 नवंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (अन्तिम भाग )

🔵 और उसके पश्चात् ध्यान की घड़ियों में मैं सदा बहार तथा भीतर एक प्राणवन्त उपस्थिति का अनुभव करता रहा एवं आनन्द में विभोर हो कर मैंने महामंत्र सुना तथा उसे दुहराता रहा।
ओम्! सदैव! सदैव! के लिये आपकी आत्मा मैं हूँ। आपकी शक्ति अनंत है।
उठो जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय बढ़ते चलो। तुम ब्रह्म हो! तुम ब्रह्म हो!!

ओम्! ओम्!! ओम!!!


🔴 अगर आप भारत को समझना चाहते हैं, तो विवेकानन्द का अध्ययन कीजिए। उनमें सब सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं है।…….
🌹 -विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर

🔵 निस्सन्देह किसी से स्वामी विवेकानन्द के लेखों के लिए भूमिका की अपेक्षा नहीं है। वे स्वयं ही अप्रतिहत आकर्षण हैं।….
🌹 - महात्मा गाँधी

🔴 उनके शब्द महान संगीत हैं, बोथोवन-शैली के टुकड़े हैं, हैंडेल के समवेत गान के छन्द- प्रवाह की भाँति उद्दीपक लय हैं। शरीर में विद्युत्स्पर्श के-से आघात की सिहरन का अनुभव किये बिना मैं उनके इन वचनों का स्पर्श नहीं कर सकता जो तीस वर्ष की दूरी पर पुस्तकों के पृष्ठों में बिखरे पड़े हैं। और जब वे नायक के मुख से ज्वलन्त शब्दों में निकले होंगे तब तो न आघात एवं आवेग पैदा हुए होंगे!
🌹 -रोमाँ रोलाँ

🌹 समाप्त
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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