सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 संसार में हम हैं। संसार में रह करके हम अपने कर्तव्य पूरे करें। हँसी-खुशी से रहें, अच्छे तरीके से रहें, लेकिन इसमें इस कदर हम व्यस्त न हो जायें, इस कदर फँस न जायें कि हमको अपने जीवन के उद्देश्यों का ध्यान ही न रहे। अगर हम फँसेंगे तो मरेंगे।

🔵 आपने उस बन्दर का किस्सा सुना होगा जो अफ्रीका में पाया जाता है-सिम्बून और जिसके बारे में ये कहा जाता है कि शिकारी लोग उसको चने, मुट्ठी भर चने का लालच देकर के उसकी जान ले लेते हैं। लोहे के घड़े में चने भर दिये जाते हैं और सिम्बून उन चनों को खाने के लिये आता है, मुट्ठी बाँध लेता है, मुट्ठी को निकालना चाहता है तो मुट्ठी निकलती नहीं है। जोर लगाता है तो भी नहीं निकलती, इतनी हिम्मत नहीं होती कि मुट्ठी को खाली कर दे, छोड़ दे और हाथ को खींचे। लेकिन वो मुट्ठी को छोड़ना नहीं चाहता है। छोड़ने के न चाहने का परिणाम ये होता है कि हाथ बाहर निकलता नहीं और शिकारी आता है, उसको मार-काट के खतम कर देता है, फिर उसकी चमड़ी को उखाड़ लेता है। हम और आपकी स्थिति ऐसी है, जैसे अफ्रीका के सिम्बून बन्दरों जैसी।

🔴 हम लिप्साओं के लिये, लालसाओं के लिये, वासनाओं के लिये, तृष्णा के लिये, अहंकार की पूर्ति के तरीके से मुट्ठी पकड़ करके बन्दरों के तरीके से फँसे रहते हैं और अपनी जीवन सम्पदा का विनाश कर देते हैं, जिससे हमको बाज आना चाहिए और हमें अपने आपको इससे बचाने के लिये कोशिश करनी चाहिए। हमको अपनी क्षुद्रता का त्याग करना है। क्षुद्रता का अगर हम त्याग कर देते हैं, तो हम कुछ खोते नहीं हैं, हम कमाते ही कमाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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