सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 37)

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    

🔴 तीसरा साप्ताहिक अभ्यास है-प्राण संचय। एकान्त में नेत्र बन्द करके अन्तर्मुखी होना चाहिये और ध्यान करना चाहिये कि समस्त विश्व में प्रचण्ड प्राण चेतना भरी हुई है। आमन्त्रित आकर्षित करने पर वह किसी को भी प्रचुर परिमाण में कभी भी उपलब्ध हो सकती है। इसकी विधि प्राणायाम है। प्राणायाम के अनेक विधि-विधान हैं। पर उनमें से सर्वसुलभ यह है कि मेरुदण्ड को सीधा रखकर बैठा जाये। आँखें बन्द रहें। दोनों हाथ घुटनों पर। शरीर को स्थिर और मन को शान्त रखा जाय।     

🔵 साँस खींचते समय भावना की जाये कि विश्वव्यापी प्राण चेतना खिंचती हुई नासिका मार्ग से सम्पूर्ण शरीर में प्रवेश कर रही है। उसे जीवकोष पूरी तरह अपने शरीर में धारण कर रहे हैं। प्राण प्रखरता से अपना शरीर, मन और अन्त:करण ओतप्रोत हो रहा है। साँस खींचने के समय इन्हीं भावनाओं को परिपक्व करते रहा जाये। साँस छोड़ते समय यह विचार किया जाये कि शारीरिक और मानसिक क्षेत्रों में घुसे हुये विकार साँस के साथ बाहर निकल रहे हैं और उनके वापस लौटने का द्वार बन्द हो रहा है। इस बहिष्करण के साथ अनुभव होना चाहिये कि भरे हुए अवांछनीय तत्त्व हट रहे हैं और समूचा व्यक्तित्व हलकापन अनुभव कर रहा है। प्रखरता और प्रामाणिकता की स्थिति बन रही है।    
                        
🔴 चौथा साप्ताहिक अभ्यास मौन वाणी की साधना है। मौन दो घण्टे से कम का नहीं होना चाहिये। मौनकाल में प्राण संचय की साधना साथ-साथ चलती रह सकती है। इस निर्धारित कृत्य के अतिरिक्त दैनिक साधना, स्वाध्याय, संयम सेवा के चारों उपक्रमों में से जो जितना बन सके उसके लिये उतना करने का प्रयास करना चाहिये। सेवा कार्यों के लिये प्रत्यक्ष अवसर सामने हो तो इसके बदले आर्थिक अंशदान की दैनिक प्रतिज्ञा के अतिरिक्त कुछ अधिक अनुदान बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह राशि सद्ज्ञान संवर्द्धन के ज्ञान यज्ञ के निमित्त लगनी चाहिये। पीड़ितों की सहायता के लिये हर अवसर पर कुछ न कुछ करते रहना सामान्य क्रम में भी सम्मिलित रखना चाहिये। ज्ञानयज्ञ तो उच्चस्तरीय ब्रह्मयज्ञ है, जिसके साथ प्राणिमात्र का कल्याण जुड़ा हुआ है। साप्ताहिक साधना का दिन ऐसे ही श्रेष्ठ सत्कर्मों में लगाना चाहिये।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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