सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 9)

🌹 विचारों का महत्व और प्रभुत्व

🔴 कुंए में मुंह करके आवाज देने पर वैसी ही प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है। संसार भी एक कुंए की आवाज की तरह ही है। मनुष्य जैसा सोचता है, विचारता है वैसी की प्रतिक्रिया वातावरण में होती है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही उसके आसपास का वातावरण बन जाता है। मनुष्य के विचार शक्तिशाली चुम्बक की तरह हैं जो अपने समानधर्मी विचारों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। एक ही तरह के विचारों के घनीभूत होने पर वैसी ही क्रिया होती है और वैसे ही स्थूल परिणाम प्राप्त होते हैं।

🔵 विचार की प्रचण्ड शक्ति असीम, अमर्यादित, अणुशक्ति से भी प्रबल विचार जब घनीभूत होकर संकल्प का रूप धारण कर लेता है तो स्वयं प्रकृति अपने नियमों का व्यतिरेक करके भी उसको मार्ग देती है। इतना ही नहीं उसके अनुकूल बन जाती है। मनुष्य जिस तरह के विचारों को प्रश्रय देता है, उसके वैसे ही आदर्श, हाव-भाव, रहन-सहन ही नहीं, शरीर में तेज, मुद्रा आदि भी वैसे ही बन जाते हैं। जहां सद्विचारों  की प्रचुरता होगी वहां वैसा ही वातावरण बन जायेगा। ऋषियों के अहिंसा, सत्य, प्रेम, न्याय के विचारों से प्रभावित क्षेत्र में हिंसक पशु भी अपनी हिंसा छोड़कर अहिंसक पशुओं के साथ विचरण करते थे।

🔴 जहां घृणा, द्वेष, क्रोध आदि से सम्बन्धित विचारों का निवास होगा वहां नारकीय परिस्थितियों का निर्माण होना स्वाभाविक है। मनुष्य में यदि इस तरह के विचार कर जांय कि मैं अभागा हूं, दुःखी हूं, दीन-हीन हूं तो उसका अपकर्ष कोई भी शक्ति रोक नहीं सकेगी। वह सदैव दीन हीन परिस्थितियों में ही पड़ा रहेगा। इसके विपरीत मनुष्य में सामर्थ्य, उत्साह, आत्मविश्वास, गौरवयुक्त विचार होंगे तो प्रगति-उन्नति स्वयं ही अपना द्वार खोल देगी। सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति का उपयोग ही व्यक्ति को सर्वतोमुखी सफलता का प्रदान करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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