रविवार, 24 जून 2018

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 1)

🔶 समुद्र में जब तक बड़े ज्वार-भाटे उठते रहते हैं तब तक उस पर जलयानों का ठीक तरह चल सकना सम्भव नहीं होता। रास्ता चलने में खाइयाँ भी बाधक होती हैं और टीले भी। समतल भूमि पर ही यात्रा ठीक प्रकार चल पाती है। शरीर न आलसी, अवसाद ग्रस्त होना चाहिए और न उस पर चंचलता, उत्तेजना चढ़ी रहनी चाहिए। मनःक्षेत्र के सम्बन्ध में भी यही बात है, न उसे निराशा में डूबा रहना चाहिए और न उन्मत्त, विक्षिप्तों की तरह उद्वेग से ग्रसित होना चाहिये। सौम्य सन्तुलन ही श्रेयस्कर है। दूरदर्शी विवेकशीलता के पैर उसी स्थिति में टिकते हैं।

🔷 उच्चस्तरीय निर्धारण इसी स्तर की मनोभूमि में उगते-बढ़ते और फलते फूलते है। पटरी औंधी तिरछी हो तो रेलगाड़ी गिर पड़ेगी। वह गति तभी पकड़ती है, जब पटरी की चौड़ाई-ऊँचाई का नाप सही रहे। जीवन-क्रम में सन्तुलन भी आवश्यक है। उसकी महत्ता पुरुषार्थ, अनुभव, कौशल आदि से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आतुर, अस्त-व्यस्त, चंचल, उद्धत प्रकृति के लोग सामर्थ्य गँवाते रहते हैं। वे उस लाभ से लाभान्वित नहीं हो पाते जो स्थिर चित्त, संकल्पवान्, परिश्रमी, दूरदर्शी और सही दिशाधारा अपना कर उपलब्ध करते हैं। स्थिरता एक बड़ी विभूति है। दृढ़ निश्चयी धीर-वीर कहलाते हैं। वे हर अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति में अपना संतुलन बनाये रहते है। महत्त्वपूर्ण निर्धारणों के कार्यान्वित करने और सफलता के स्तर तक पहुँचने के लिए मनःक्षेत्र को ऐसा ही सुसन्तुलित होना चाहिए।

🔶 निराशा स्तर के अवसाद और क्रोध जैसे उन्माद आवेशों से यदि बचा जा सके तो उस बुद्धिमानी का उदय हो सकता है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्रज्ञा कहते और जिसे भाग्योदय का सुनिश्चित आधार माना जाता है। ऐसे लोगों का प्रिय विषय होता है उत्कृष्ट आदर्शवादिता। उन्हें ऐसे कामों में रस आता है, जिनमें मानवी गरिमा को चरितार्थ एवं गौरवान्वित होने का अवसर मिलता हो। भविष्य उज्ज्वल होता हो और महामानवों की पंक्ति में बैठने का सुयोग बनता हो। इस स्तर के विभूतिवान बनने का एक ही उपाय है कि चिन्तन को उत्कृष्ट और चरित्र, कर्तृत्व से आदर्श बनाया जाय। इसके लिए दो प्रयास करने होते है, एक संचित कुसंस्कारिता का परिशोधन उन्मूलन। दूसरा अनुकरणीय अभिनन्दनीय दिशाधारा का वरण, चयन। व्यक्तित्वों में उन सत्प्रवृत्तियों का समावेश करना होता हैं जिनके आधार पर ऊँचा उठने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। कहना न होगा कि गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टता ही किसी को सामान्य परिस्थितियों के बीच रहने पर भी असामान्य स्तर का वरिष्ठ अभिनन्दनीय बनाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

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