मंगलवार, 26 जून 2018

👉 संत की चिन्ता

🔶 एक नगर मे एक संत चिन्ता मे खोये हुये थे! संसारी का रोना स्वार्थ का होता है उसकी चिन्ता अपने स्वार्थ के लिये होती है पर सच्चे संत का रोना और उनकी चिन्ता परमार्थ के लिये होती है !

🔷 एक नगर के बाहर एक सन्त रहते थे कई व्यक्ति वहाँ आया जाया करते थे और वहाँ सच्चे जिज्ञासु भी अक्सर वहाँ आया जाया करते थे! अनेक लोग आते और केवल अपने दुखों का रोना रोते और चले जाते! एक दिन सन्त श्री नगर भ्रमण गये और वापस आकर पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गये और बड़ी चिन्ता मे डुबे हुये गहरे चिन्तन मे खोये हुये थे इतनी चिन्ता मे खोये हुये थे की उनके सामने अनेक व्यक्ति और जिज्ञासु का दल आकर बैठ गया पर उन्हे पता न चला! फिर सहसा उनकी द्रष्टि उनपर पड़ी!

🔶 जिज्ञासु दल - क्या हुआ नाथ आप ऐसी कौनसी चिन्ता मे खोये हुये थे?

🔷 सन्त श्री - हॆ वत्स जब महानगर को देखा तो उसकी हालत देखकर बड़ा दुःख हो रहा है! चारों तरफ आग लगी हुई है!

🔶 जिज्ञासु - कैसी आग हॆ नाथ?

🔷 सन्त श्री - आग लगी है चारो तरफ़ कुसंस्कारों की , अंधी दौड़ की, अश्लीलता की, मूर्खतापूर्ण देखादेखी की, कामवासना की और आसूरी शक्तियां छाई हुई है चारो तरफ समझदार समझ जायेगा आग से बच जायेगा पर मुर्ख और कुतर्की आग मे जलकर राख हो जायेंगे मिट्टी मे मिलकर खाक हो जायेंगे!

🔶 साधक - तो हम क्या करें देव?

🔷 संत श्री - अपना कर्तव्य निभाओ और आपका पहला कर्तव्य है की आप अधिक से अधिक को इस आग से बचाओ दूसरा कर्तव्य है की आसपास के लोगों को बचाओ और कोई न सुने तो कम से कम अपने आपको तो इस आग से बचाओ!

🔶 जिज्ञासु - कैसे बचाये हॆ नाथ इस भयंकर ज्वाला से?

🔷 संत श्री - भक्तिरूपी नियमित साधना की चादर ओढ़ लो वत्स और साधना की चादर अधिक से अधिक लोगों को ओढाओ और और मुर्ख और कुतर्की न ओढ़े तो कम से कम तुम तो अपने आप को नियमित-साधना की चादर से अपने आपको बचाओ! और एक बात याद रखना वत्स ये आग बड़ी भयंकर है जो दिख रही है समझ भी रहे है पर अपनो कुतर्कों की वजह से और धर्म व संत की अवहेलना करने की वजह वो इस आग मे जल रहे है!

🔶 सभ्यता और मर्यादाओं का उल्लंघन पे उल्लंघन किये जा रहे है बार बार समझा रहे है की सच्ची शान्ति चाहते हो तो धर्म वृक्ष की छाँव मे मर्यादा से बैठ जाओ! अब जो मान लेगा तो कल्याण हो जायेगा और जो नही मानेगा उन्हे फिर भयंकर दूरगामी परिणाम भोगने पडेंगे!

🔷 इसलिये ईश्वर से यही प्रार्थना करना की हॆ नाथ ऐसी बुद्धि देना की मैं आपको भूलु नही और यदि एक को याद रख लिया और बाकी को भुल भी गये तो कोई दिक्कत नही और यदि सब को याद रख के उस एक को भुला दिया तो कोई मतलब नही !

👉 दूसरे की गलती से सीखें

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