शुक्रवार, 3 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 5)

🌹 चेतना की सत्ता एवं उसका विस्तार

🔵 चतुरता के बलबूते अपने यहाँ तो अनेक अपराधी दंड पाने से बच जाते हैं, पर सर्वव्यापी और सर्वसाक्षी न्यायाधीश के न्याय में किसी को ऐसे अवसर नहीं मिलते । इस वास्तविकता से असहमत रहने के कारण ही लोग प्राय: नास्तिक बन जाते हैं— कर्मफल की मान्यता का उपहास उड़ाते हुए स्वेच्छाचार बरतते हैं। विवेक होने की समझ तभी आती है जब समयानुसार क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आ खड़ी होती है।         

🔴 यहाँ तो प्रसंग इस बात का चल रहा है कि ईश्वर और जीव आपस में अविच्छिन्न होकर रह रहे हैं-अत्यंत सघन भाव और अविच्छिन्न साथी-सहचर की तरह। स्थिति को देखते हुए इस बात की पूरी गुंजाइश है कि समर्थ बीज से उपजा समर्थ बालक अभीष्ट सहयोग प्राप्त कर सके और अभावग्रस्तता की दु:खदाई स्थिति से सरलतापूर्वक छूट सके। पर प्रचलित विडंबनाओं में से एक यह भी है कि नितांत निकट रहते हुए भी परिचय ऐसा बना लिया गया है, मानो एक दूसरे से नितांत अपरिचित हैं। कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि विशालकाय नगरों में एक ही बड़े भवन की चारदीवारी में रहने वाले किरायेदार एक-दूसरे से परिचित तक नहीं होते।

🔵 हम अपने शरीर के भीतरी अवयवों को भी पूरी तरह कहाँ समझ पाते हैं! शरीर में समाये विषाणुओं का पता नहीं चलता और यह भी नहीं बन पड़ता कि उनके कारण उत्पन्न होने वाले खतरों को समझ सकें और समय रहते कुछ उपाय-उपचार कर सकें। समझदार कहे जाने वाले मनुष्य के इस भुलक्कड़पन को देखते हुए उसे नासमझ कहा जाए तो कुछ भी अनुचित न होगा। स्वस्थ दीखने वाले भी अस्वस्थता से जकड़े हुए हैं-घुन लगी लकड़ी की तरह भीतर ही भीतर पोले हो रहे हैं; स्थिति इतनी बदतर है कि अणु से लेकर विराट् विभु के कण-कण में एक अत्यंत सुव्यवस्था के संव्याप्त होने पर भी अपनी अकल यही धोखा देती रहती है कि इस खेत का कोई बोने वाला या रखवाला नहीं है-चाहे जो करने और चाहे जो पाने की मनमानी करते रहने में कोई हर्ज नहीं। आम प्रचलन में इन दिनों ऐसे ही सोच की भरमार है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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