शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

👉 खुशियों का खजाना

खुशियाँ चाहते हो? तो सबसे पहले अन्तस् में खोजो। इन्हें बाह्य परिस्थिति में नहीं आन्तरिक मनःस्थिति में ढूँढो। जो खुशियों की खोज अन्तस् में करता है, उसे फिर इन्हें कहीं अन्यत्र नहीं खोजना पड़ता। और जो यहाँ खोजने की कोशिश न करके बाहर खोजता है, वह सदा खोजता ही रहता है, किन्तु पाता कुछ भी नहीं है।
  
एक भिखारी था, वह जिन्दगी भर एक ही जगह पर बैठकर भीख माँगता रहा। उसकी ख्वाहिश थी कि वह भी धनवान् बने। इसलिए वह दिन में ही नहीं रात में भी भीख मांगता। जो कुछ उसे भीख में मिलता उसे खर्च करने की बजाय जोड़ता रहता। अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उसने दिन-रात भरपूर कोशिश की। लेकिन वह कभी भी धनवान न हो सका। वह भिखारी की ही तरह जिया और भिखारी की ही तरह मरा। जब वह मरा तो उसके कफन के लायक भी पूरे पैसे उसके पास नहीं थे। उसके मर जाने के बाद आस-पास के लोगों ने उसका झोपड़ा तोड़ दिया। फिर सबने मिलकर वहाँ की जमीन साफ की। सफाई करने वाले इन सभी को तब भारी अचरज हुआ, जब उन्हें उस जगह पर बड़ा भारी खजाना गड़ा हुआ मिला। यह ठीक वही जगह थी, जिस जगह पर बैठकर वह भिखारी जिन्दगी भर भीख माँगा करता था। जहाँ पर वह बैठता था, उसके ठीक नीचे यह भारी खजाना गड़ा हुआ था।
  
जो खुशियों की तलाश में बाहर भटकते हैं, उनकी हालत भी कुछ ऐसी ही है। क्या हममें से हर एक के भीतर ही वह खुशियों का खजाना नहीं छुपा हुआ है, जिसे कि हम सब उम्र भर बाहर खोजते रहते हैं। इसके पहले कि खुशियों के खजाने की तलाश में, आनन्द और आलोक की खोज में, शान्ति और समृद्धि की चाहत में तुम यात्रा की शुरुआत करो, सबसे पहले तो उस जगह को खोज लेना, वहीं पर खोद लेना, जहाँ कि तुम खड़े हो। क्योंकि बड़े से बड़े खोजियों ने, यात्रियों ने सारी दुनियां में, सारी उम्र भटक कर अन्ततः यह खुशियों का खजाना अपने ही अन्तस् में पाया है। इसलिए अन्यत्र इसकी खोज व्यर्थ ही है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२

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