शनिवार, 22 अप्रैल 2017

👉 तुम उसे अवश्य पा लोगे

🔵 किसी पहाड़ी झील पर नजर डालो। तुषार की रूपहली चादर बिछी हुई है। हवा चलती है, पानी बरसता है। बादल गरजते हैं, बिजली चमकती है,  किन्तु झील की निश्चलता में कोई अन्तर नहीं आता। किनारों पर रंग-बिरंगे पक्षी कूँजते और किल्लोल करते हैं, किन्तु उस झील में कोई विक्षेप उत्पन्न नहीं होता। तट पर फैली वृक्षावली में एक से एक सुन्दर, सुगन्धित फूल खिलते, शाखा में से टूटकर झील पर गिरते हैं। किन्तु झील के स्थिर हृदय में उनका कोई प्रतिबिम्ब नहीं उठता। वह अपने निर्विकल्पता का धैर्य है, जिसे तुम अवश्य पा लोगे।

🔴 कुम्हार तालाब से मिट्टी खोद लाता है। उसे कूट-पीस कर महीन बनाता और छानकर साफ करके पानी डालकर उसे खूब रौंदता, पीटता है। तैयार हो जाने पर, चाक पर चढ़ाकर अपनी इच्छा के अनुसार वह उसे आदमी, पशु या पक्षी का रूप देता है, किन्तु इतना सब होने पर भी मृत्तिका कुछ नहीं बोलती। सब कुछ समभाव से सहन करती हुई कुम्भकार की इच्छा-वशवर्ती रहती है। यदि तुममें उस मृत्तिका की भाँति सहनशीलता और नम्रता है, तो तुम उसे अवश्य पा लोगे।
  
🔵 मरुस्थल में भटके प्राणी की वांछा में पानी पीने की लालसा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। पानी के लिए उसकी व्याकुलता इतनी बढ़ जाती है कि उसे तपती रेत के कणों में पानी का आभास होने लगता है। वह छटपटाता है, दौड़ता है, विकलाता है, उसकी चाह होती है कि किसी पानी से लबालब भरे जलाशय की नहीं, सिर्फ एक बूँद जल की। वह बूँद में ही अपने सर्वस्व को खोजता है। पनघट पर खड़े पथिक की प्यास में न तो इतनी व्याकुलता होती है और न एकान्तिकता।
  
🔴 वह पानी के अतिरिक्त वहाँ के दृश्य भी देखता और रस भी लेता है। वहाँ पास में खड़े लोगों से गप-शप का आनन्द भी लूटने लगता है। यदि तुम उसे पाना चाहते हो, तो पनघट पर खड़े प्यार से पथिक की इच्छा नहीं, मरुस्थल में भटके तृषित प्राणी की आकांक्षा लेकर चलो, एक दिन तुम उसे अवश्य पा लोगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 37

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