गुरुवार, 15 जून 2017

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 13)

🌹  मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रख रहेंगे।

🔵 मन का स्वभाव बालक जैसा होता है, उमंग से भरकर वह कुछ न कुछ कराना एवं बोलना चाहता है। यदि दिशा दी जाए और उसकी क्रियाशीलता के अनुसार कार्य मिलता रहे, तो वह स्वयं भी संतोष पाता है तथा दूसरों को भी सुख देता है। मन के लिए उसकी कल्पना-शक्ति के अनुसार सद्विचारों एवं सद्भावनाओं का क्षेत्र खोल दिया जाए, तो वह संतुष्ट भी रहता है तथा हितकारी भी सिद्ध होता है। स्नेह, कृतज्ञता, सौहार्द्र सहयोग आदि के विचारों को बार-बार दुहराया जाए, तो मन में कुविचारों और दुर्भावनाओं को जगह न मिलेगी।

🔴 परिस्थिति एवं वातावरण के प्रभाव से बहुत बार मन पर उनका असर होने लगता है। उस स्थिति में कुविचारों के विपरीत, सशक्त सद्विचारों से उन्हें काटना चाहिए। जैसे स्वार्थपरता, धोखेबाजी, कामचोरी के विचार आएँ तो श्रमशीलता और प्रमाणिकता से लोगों की अद्भुत प्रगति के तथ्यपूर्ण चिंतन से उन्हें हटाया जा सकता है। यदि किसी के विपरीत आचरण पर क्रोध आए या द्वेष उभरे तो उसकी मजबूरी समझकर उसके प्रति करुणा, आत्मीयता से उसे धोया जा सकता है। यह विद्या सत्साहित्य के स्वाध्याय, सत्पुरुषों की संगति एवं ईमानदारी से किए गए आत्म-चिंतन से ही पाई जा सकती है।    

🔵 लोहा, लोहे कोक काटता है। गरम लोहे को ठंडा लोहे की छैनी काटती है। चुभे हुए काँटे को निकालने के लिए काँटे का ही प्रयोग करना पड़ता है। विष को विष मारता है। हथियार से हथियार को मुकाबला किया जाता है। किसी गिलास में भरी हुई हवा को हटाना हो तो उसमें पानी भर देना चाहिए। पानी का प्रवेश होने से हवा अपने आप निकल जाएगी। बिल्ली पाल लेने से चूहे घर में कहाँ ठहरते हैं? कुविचारों को मार भगाने का एक तरीका है कि उनके स्थान पर सद्विचारों की स्थापना की जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.20

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

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