सोमवार, 13 मार्च 2017

👉 विवाह की अपेक्षा सेवा धर्म श्रेयष्कर

🔴 एक साथ, एक ही गॉव में छह बच्चे एक ही बीमारी से पीडित। सभी लकवे के शिकार है। तेज और असह्य बुखार। उसने ऐसे मरीज पहले कभी न देखे थे।

🔵 यह बात १९१० ई० की है, जब एक युवती अपने घोडे पर चढी़ आस्ट्रेलिया के एक आदिवासी क्षेत्र में घूमने आई थी। अब तक जिसे अपने वैभव और ऐश्वर्य से ही अवकाश न मिलता था, आज उसे पता चला कि दुनिया में दैन्य और दारिद्रय भी कम नहीं। परमात्मा के प्रति वह कृतज्ञ होती आई थी, पर जब उसने देखा कि हमने स्वयं उसकी अनंत कृपा के प्रति अपना कर्तव्य-भाव जागृत नहीं किया तो उसे बडी ग्लानि हुई। जब आधे से अधिक संसार अविकसित, अशिक्षित और पीड़ाओं से घिरा पडा हो तो साधन संपन्न खुशियाँ मना रहे हों यह कल्पना भी उसे असह्य प्रतीत हुई। एक डॉक्टर को तार भेजा। डॉक्टर ने जबाव भेजा अभी समय नहीं है।

🔴 उसने थोड़ी नर्सिग सीखी थी। डाक्टरों के अध्ययन से भी कुछ समाधान प्राप्त किये थे सो उसने अपने ही विश्वास पर औषधि मँगाकर उन बच्चों को दी। थोडी गर्मी प्रतीत हुई। जिन अंगों में रक्त-संचार बंद हो गया था, धीरे-धीरे फिर प्रारंभ हो गया। कई दिन कई रातों की अथक सुश्रूषा के बाद बच्चे उठ बैठे। युवती को ऐसा लगा जैसे सेवा के सुख से बढकर संसार में और कोई वस्तु नहीं। सम्मान तो सब कोई ले सकता है, पर आत्मीयता भरा प्यार का आनंद वही प्राप्त कर सकता है, जिसे सेवा का सौभाग्य मिला हो।

🔵 यह बात डॉक्टरो ने सुनी। उन्होंने इस लड़की की बडी़ प्रशंसा की और उसे नियमित रूप से नर्सिग करने के लिए प्रोत्साहित किया। लड़की को अपनी योग्यता पर विश्वास न था, सो वह बोली- यह जो कुछ हुआ वह भगवान् की कृपा मात्र थी, मै तो नर्सिंग पढी़ भी नही, मुझमें यह योग्यता कहाँ से आयेगी ?

🔴 एक डॉक्टर ने कहा क्षमता अपने भीतर से उत्पन्न होती है। तुम नहीं जानती मनुष्य में कितनी शक्ति है ? उसका उपयोग न करने के कारण सब कुछ असंभव लगता है, यदि तुम अपने आप पर विश्वास करो तो इन्हीं परिस्थितियों में पहाड़ के बराबर काम कर सकती हो?

🔵 'सचमुच कोई क्षमता जाग जाए तो हर व्यक्ति एक-डॉक्टर है, शिक्षक है, इंजीनियर है, नेता है, समाज सुधारक है। मनुष्य का ढाँचा सर्वत्र एक है, एक ही दिशा में योग्यता का विकास ही उसे डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, नेता या समाज-सुधारक बना देता है। 'चाहे यह योग्यता विद्यालय में विकसित हुई हो या अपने आप पैदा कर ली गई हो। दोनों ही रास्ते एक ही लक्ष्य की पूर्ति करते हैं।

🔴 लडकी ने अपनी योग्यताएँ बढा़नी शुरू की। नर्सिंग की अनेकों पुस्तकें मंगाकर उसने पढी़। डॉक्टरों से पूछताछ की। सामान्य मरीजों पर औषधियों के प्रयोग किए, हिम्मत खुलती चली गई और एक दिन उसने यह सिद्ध कर दिखाया कि योग्यताएँ संस्थानो में ही नहीं पनपती, वरन् घरों में अवकाश के प्रत्येक क्षण के उपयोग से कहीं भी बैठकर वे बढा़ई जा सकती हैं। ऐसी योग्यताऐं किसी भी विधिवत् शिक्षण प्राप्त योग्यता से कम नहीं होतीं। प्रमाणत वह प्रथम महायुद्ध में एक जहाजी अस्पताल में नर्स नियुक्त कर ली गई।

🔵 बहुत दिनों से उसके एक संबंधी की इच्छा थी कि वह शादी कर ले। उन्होंने विनम्र भाव से अपनी असहमति प्रकट करते हुए कहा- जब बहुत सारा संसार दीन-हीन अवस्था में पडा हो तब कुछ ऐसे व्यक्ति भी निकलने ही चाहिए जो सांसारिक सुखों का स्वेच्छा से त्यागकर अपने आपको इन कल्याण कार्यों में नियोजित कर सकें। मेरे लिए अब 'सेवा ' ही शादी है। लौकिक सुखों का यों परित्याग करते और अपनी योग्यताऐं बढा़ने के लिए प्रति पल सन्नद्ध रहने वाली, किसी स्कूल से जिसे डिग्री नहीं मिली, यही वीर बाला एक दिन सिस्टर एलिजाबेथ केनी के नाम से सारे विश्व में विख्यात हुई। उसकी शोध की हुई अनेक औषधियाँ अमेरिका, पेरिस, ब्रसेल, मास्को और ब्रिटेन तक पहुँची। अनेक विश्व विद्यालयों ने उसे डॉक्ट्रेट ' की उपाधि से विभूषित किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 79, 80

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