शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 4)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा    
🔴 प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं। विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है। साधारण जनों को तो जिन्दगी के दिन पूरे करने में ही जो दौड़-धूप करनी पड़ती है, झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है, उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं। पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है; किन्तु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह स्वयं सुन्दर और अपनी छत्र-छाया के सम्पर्क में आने वालों को शोभा-सुन्दरता से जगमगा देते हैं।        

🔵 प्रतिभावानों को उदीयमान सूर्य भी कह सकते हैं, जिसके दर्शन होते ही सर्वत्र चेतना का एक नया माहौल उमड़ पड़ता है। वे ऊर्जा और आभा के स्वयं तो उद्गम होते ही हैं, अपनी किरणों का प्रभाव जहाँ तक पहुँचा पाते हैं, वहाँ भी बहुत कुछ उभारते-बिखेरते रहते हैं। सच तो यह है कि नर-वानर को शक्ति-पुञ्ज बनाने का श्रेय प्रतिभा को ही है। प्रतिभा ही शरीर में ओजस्विता, मानस में तेजस्विता और अन्त:करण में विभूति भरी वर्चस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। मनुष्य की अपनी निजी विशेषता का परम पुरुषार्थ यही है। जो इससे वञ्चित रह गया, उसे मार्ग ढूँढ़ने का अवसर नहीं मिलता। मात्र अन्धी भेड़ों की तरह जिस-तिस के पीछे चलकर, जहाँ भाग्य ले पहुँचाता है, वहाँ जाकर, ऐसा व्यक्ति अशक्त परावलम्बियों जैसा जीवन जीता है। कठिनाइयों के समय यह मात्र घुटन अनुभव करता और आँसू भर बहाकर रह जाता है।

🔴 संसार असंख्य पिछड़े लोगों से भरा पड़ा है। वे गई-गुजरी जिन्दगी जीते और भूखे-नंगे तिरस्कृत-उपेक्षित रहकर किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। निजी समर्थता का अभाव देखकर उन पर विपन्नता और प्रतिगामिता के अनेक उद्भिज चढ़ दौड़ते हैं। दुर्व्यसन दुर्बल मनोभूमि वालों पर ही सवार होते हैं और उन्हें जिधर-तिधर खींचते-घसीटते फिरते हैं। ऐसे भारभूत लोग अपने लिए, साथी-सहयोगियों के लिए और समूचे समाज के लिए एक समस्या ही बने रहते हैं। इन्हीं का बाहुल्य देखकर अनाचारी अपने पञ्जे फैलाते, दाँत गड़ाते और शिकञ्जे कसते हैं। प्रतिभारहित समुदाय का धरती पर लदे भार जैसा आँकलन ही होता है। वे किसी की कुछ सहायता तो क्या कर सकेंगे, अपने को अर्धमृतक की तरह किन्हीं के कन्धों पर लादकर चलने का आश्रय ताकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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