शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

👉 विनयात् याति पात्रवाम्

🔴 विनयशीलता, नम्रता, सौम्यता व्यक्तित्व को उच्च स्थिति प्रदान करते है। लोगों के अंतःकरण जीतने का सबसे सरल मंत्र है कि हमारा जीवन, हमारा व्यवहार अत्यंत विनम्र हो।

🔵 यह धारणा डॉ० राजेंद्र प्रसाद की थी। जो अपनी विनम्रता के बल पर ही कम शिक्षा, अत्यंत सादगी, वहुत सरल विचारों के होते हुए भी, इस देश के सर्वप्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और जब तक रहे उसी आदर भावना से उच्च पद पर प्रतिष्ठित रखे गए।

🔴 सामान्य लोगों में बडे़ और जिनसे स्वार्थ सधता हो उन्हीं तक विनम्र होने का संकीर्ण स्वभाव रहता है। आफिस में अफसर के सामने बहुत उदार हो जाते हैं, पर घर में पत्नी, बच्चे, नौकर के सामने ऐसे अकड़ भरते है जैसे वह कोई सेनापति हो, और वैसा करना आवश्यक हो, जिसने विनम्रता-सौम्यता त्यागी, उसने अपना जीवन जटिल बनाया प्रेम, स्नेह, आत्मीयता और सद्भाव का आनंद गँवाया। यदि इस जीवन को सफल, सार्थक और आनंदयुक्त रखना है तो स्वभाव उदार होना चाहिए। यह मनुष्यता की दृष्टि से भी आवश्यक है कि दूसरों से व्यवहार करते समय शब्दों और भाव-भंगिमाओं से कटुता प्रदर्शित न की जाए।

🔵 राजेंद्र बाबू के राष्ट्रपति जीवन की एक घटना है। उनकी हजामत के लिये जो नाई आया करता था, उसके हाथ-मुँह साफ नही रहते थे। गंदगी किसी को भी अच्छी नहीं लगती, तो फिर वह क्यों पसंद करते 'उन्होंने नाई से कहा आप हाथ-मुँह साफ करके आया करे। यह कहते हुए उन्होंने शब्दो में पूर्ण सतर्कता रखी। जोर न देकर शिष्ट भाव अधिक था, तो भी उन सज्जन पर इन शब्दों का कोई प्रभाव न पडा। वे अपने पूर्व क्रमानुसार ही आते रहे।

🔴 राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति थे। अपने अधिकारियों से वे कठोर शब्दों में कहला सकते थे। यह भी संभव था कि नाई बदलवाकर किसी स्वच्छ साफ-सुथरे नाई की व्यवस्था कर लेते, पर मानवीयता की दृष्टि से उन्होंने इनमें से किसी की आवश्यकता नहीं समझी। एक व्यक्ति को सुधार लेना अच्छा, उसे बलात् मानसिक कष्ट देना या बहिष्कार करना अच्छा नहीं होता। मृदुता और नम्र व्यवहार से पराए अपने हो जाते हैं तो फिर अपनों को अपना क्यों नही बनाया जा सकता।

🔵 पर अब उन्हें इस बात का संकोच था कि दुबारा कहने से उस व्यक्ति को कहीं मानसिक कष्ट न हो। कई दिन उनका मस्तिष्क इन्हीं विचारों में घूमता रहा। यह भी उनका बडप्पन ही था कि साधारण-सी बात को भी उन्होंने विनम्रतापूर्वक सुलझाने में ही ठीक समझा।

🔴 दूसरे दिन नाई के आने पर बडी़ विनम्रता से बोले- आपको बहुत परिश्रम करना पड़ता होगा, उससे शायद वहाँ समय न मिलता होगा, इसलिए यहाँ आकर हाथ-मुँह धो लिया करे।

🔵 नाई को अपनी गलती पर बडा दुःख हुआ, साथ ही वह राजेंद्र बाबू की सहृदयता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने अनुभव किया कि छोटी-छोटी बातों की उपेक्षा करने से ही डॉट-फटकार सुननी पडती है, पर विनम्रता से तो उसे भी ठीक किया जा सकता है। उसने उस दिन से हाथ-मुँह धोकर आने का नियम बना लिया। फिर कोई शिकायत नहीं हुई और न कोई कटुता ही पैदा हुई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 48, 49

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