मंगलवार, 26 जुलाई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 65) 👉 परमशान्ति की भावदशा


🔴 बात भी सही है, जो सीखा गया था, जो जाना गया था, वह तो संसार के लिए था। अब जब चेतना का आयाम ही बदल गया तो सीखे गए, जाने गए तत्त्वों की जरूरत क्या रही। इसीलिए यहाँ कोई नहीं है और न ही पथ प्रदर्शन की जरूरत। यह तो मंजिल है, और मंजिल में तो सारे पथ विलीन हो जाते हैं। जब पथ ही नहीं तब किस तरह का पथ- प्रदर्शन। यहाँ तो स्वयं को प्रभु में विलीन कर देने का साहस करना है। बूंद को समुद्र में समाने का साहस करना है। जो अपने को सम्पूर्ण रूप से खोने का दुस्साहस करता है, वही प्रवेश करता है। इसीलिए सूत्र कहता है कि यहाँ न तो कोई नियम है और न कोई पथ प्रदर्शक।
      
🔵 यहाँ खड़े होकर- जो मूर्त नहीं है और अमूर्त भी नहीं है, उसका अवलम्बन लो। मूर्त यानि कि पदार्थ अर्थात् साकार। और अमूर्त अर्थात् यानि कि निराकार। सूत्र कहता है कि इन दोनों को छोड़ो। और दोनों से पार चले जाओ। यह सूत्र थोड़ा समझने में अबूझ है। परन्तु बड़ा गहरा है। मूर्त और अमूर्त ये दोनों एक दूसरे के विपरीत है। इन विरोधो में द्वन्द्व है। और शिष्य को अब द्वन्द्वों से पार जाना है। इसलिए उसे इन दोनों के पार जाना होगा। सच तो यह है कि मूर्त और अमूर्त में बड़ा भारी विवाद छिड़ा रहता है। कोई कहता है कि परमात्मा साकार है तो कोई उसे निराकार बताता है। और साकारवादी और निराकारवादी दोनों झगड़ते रहते हैं। जो अनुभवी हैं- वे कहते हैं कि परमात्मा इस झगड़े के पार है। वह बस है, और जो है उसे अनुभव किया जा सकता है। उसे जिया जा सकता है, पर उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। जो नहीं कहा जा सकता, उसी में लय होना है।
    
🔴 अगली बात इस सूत्र की और भी गहरी है। इसमें कहा गया है- केवल नाद रहित वाणी सुनो। बड़ा विलक्षण सच है यह। जो भी वाणी हम सुनते हैं, वह सब आघात से पैदा होती है। दो चीजों की टक्कर से, द्वन्द्व से पैदा होती है। हवाओं की सरसराहट में वृक्षों के झूमने, पत्तियों के टकराने का द्वन्द्व है। ताली बजाने में दोनों हाथों की टकराहट है। हमारी वाणी भी कण्ठ की टकराहट का परिणाम है। जहाँ- जहाँ स्वर है, नाद है, वहाँ- वहाँ आहत होने का आघात है। परन्तु सन्तों ने कहा है कि एक नाद ऐसा भी है, जहाँ कोई किसी से आहत नहीं होता। यहाँ नाद तो है, पर अनाहत है।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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