शुक्रवार, 17 मार्च 2017

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 21)

🌹 प्रगति के कदम-प्रतिज्ञाएँ

🔴 हममें से हर आदमी को आलस्यरहित होना चाहिए। दिनचर्या बनाकर चलना चाहिए और काम करना चाहिए। हमारे स्वभाव के बहुत सारे दोष और दुर्गुण हैं।  इसमें खास तौर से क्रोध करना और आवेश में आ जाना, दूसरों को कड़वे वचन कह देना और बेकाबू हो जाना। ये तो बुरी बात है और आदमी का लोभ उतना करना, जिससे कि सारे के सारे अपने धन और क्षमता को केवल अपने शरीर व अपने कुटुम्ब के लिए खर्च करे। जिसकी ये हिम्मत न पड़े कि हमको समाज के लिए खर्च करना चाहिए और समाज के लिए अनुदान देना चाहिए। ऐसे आदमी को लोभी, कंजूस और कृपण कहा जाता है। आदमी को कृपण, कंजूस और लोभी नहीं होना चाहिए।        

🔵 समाज के प्रति व्यक्ति को उत्तरदायित्वों को पूरा करना चाहिए। काम वासना का अर्थ है कि नारियों के प्रति और दूसरे लिंग के प्रति, मनुष्य को दुर्भावनाएँ और पापवृत्तियाँ नहीं रखनी चाहिए। स्त्रियाँ हैं तो क्या? पुरुष हैं तो क्या? इनसान तो हैं। इनसान, इनसान के प्रति अच्छे भाव रखे। उनमें सरसता के भाव रखे, तो इसमें क्या बुरा है? काम वासना की बात सोचे, ये क्या बात है? स्त्री है, इसका मतलब कि ये सिर्फ काम- वासना के ही लिए है क्या?    

🔴 हमारी माँ भी तो स्त्री है, बहिन भी तो स्त्री है, हमारी बेटी भी तो स्त्री ही है। क्या हम काम- वासना के भाव रखते हैं? स्त्री- पुरुष के बीच एक काम- वासना का ही रिश्ता है क्या? नहीं, ये बहुत बुरी बात है। दिमाग में काम- वासना के विचारों को रखे रहना और क्रोध का आचार, बात- बात में आवेश में आ जाना, दूसरों की गलतियों के ऊपर आपे से बाहर आ जाना ठीक नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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