शुक्रवार, 17 मार्च 2017

👉 पीड़ित मानवता की करुणाशील सेवा

🔵 ज्येष्ठ का महीना था। दोपहर की कडकडा़ती हुई धूप अपनी चरम सीमा पर थी। इन्हीं दिनों ईश्वरचंद्र विद्यासागर को बंगाल के कालना गाँव में आवश्यक काम से जाना पडा।

🔴 अभी कुछ ही दूर गये होंगे, एक गरीब आदमी कराहता, हाँफता हुआ रास्ते पर पडा़ दिखाई दिया। उन्होंने दखा कि उसकी गठरी एक तरफ पडी़ हुई है। दूसरी तरफ फटे-पुराने कपडो़ से अपना तन किसी तरह ढके हुए तडफडा रहा है। 

🔵 दीन-हीन नेत्रों से किसी की सहायता के लिए देख रहा है, पर किसका ध्यान उसकी तरफ जाता है ? सभी लोग आते और उसे ऐसी अवस्था में देखकर आँखें फेरते हुए चले जाते। मानो उसे देखा ही नहीं। बेचारा हैजे से बुरी तरह पीडित हो चुका था, कपडे़ मल-मूत्र में सन चुके थे।

🔴 उसे इस स्थिति में देखते ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर का दयालु हृदय करुणा से उमड़ पड़ा। काम तो बडा़ जरूरी था और शीघ्र आवश्यक था। पर उससे भी आवश्यक काम यह दिखाई लगा। अपने कंधे में लटकता हुआ बैग उतारकर एक तरफ रख दिया। रोगी के पास जाकर उसकी स्थिति को अच्छी तरह समझा। उस बेचारे की तो दम निकल रही थी। उसके सिर और पीठ पर हाथ फेरा और कुछ पूछा। पर वह कहाँ बोलता ?  इशारे रो पानी माँगा। आशय समझ गये। चलते समय उन्होंने बैग में शीशियाँ रख ली थीं। तुरंत ही पानी लाए और एक खुराक दवा दी। कपड़े वगैरा कुछ साफ किए। हाथ-पैरों और शरीर में लगी हुई टट्टी साफ की और तुरंत ही अपनी पीठ पर लादकर गॉव को चल दिए।

🔵 साथ में एकदूसरे अधिकारी गिरीशचंद्र जी भी चुप न रह सके। कुछ तो उन्हें भी करना चाहिए था। सो लोक-लाज वश उन्होंने भी पास ही पडी हुई बीमार की गठरी सिर पर रखकर पीछे-पीछे चल दिए। गाँव अभी काफी दूर था। बीच बीच में श्री गिरीश जी रोगी को ले चलने में सहायता करने की बात पूछते, परंतु विद्यासागर ने यही कहा- ''आपका इतना सहयोग भी हमें बहुत साहस दे रहा है। चिंता न करें, हमें कोइ कष्ट नहीं है। गाँव तक सुगमता से लिये चलेंगे।

🔴 कालना पहुँचते ही रोगी को तुरंत उन्होंने हॉस्पिटल में भरती कराया। कालना बडा गाँव है और अच्छा हॉस्पिटल है, डॉक्टर से तुरत मिले और रोगी की स्थिति का पूरा-पूरा विवरण दिया। वहाँ कुछ समय तक रुककर रोगी की सेवा सुश्रूषा में स्वयं भी हाथ बटाते रहे। जब रोगी पूरी तरह अच्छा हो गया तो उसे कुछ रुपये देकर विदा किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 87, 88

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