शुक्रवार, 17 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 39)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 अन्धविश्वासियों के विचार में भूत प्रेतों का अस्तित्व होता है और उसी दोष के कारण वे कभी-कभी खेलने-कूदने और तरह तरह की हरकतें तथा आवाजें करने लगते हैं। यद्यपि ऊपर किसी बाह्य तत्व का प्रभाव नहीं होता तथापि उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें किसी भूत अथवा प्रेत ने दबा लिया है। किन्तु वास्तविकता यह होती है कि उनके विचारों का विकार ही अवसर पाकर उनके सिर चढ़कर खेलने लगता है। किसी दुर्बुद्धि अथवा दुर्बलमना व्यक्ति का जब यह विचार बन जाता है कि कोई उस पर उसे मारने के लिए टोना कर रहा है तब उसे अपने जीवन का ह्रास होता अनुभव होने लगता है।

🔵  जितना-जितना यह विचार विश्वास में बदलता जाता है उतना उतना ही वह अपने को क्षीण, दुर्बल तथा रोगी होता जाता है अन्त में ठीक-ठीक रोगी बन कर एक दिन मर तक जाता है। जबकि चाहे उस पर कोई टोना किया जा रहा होता है अथवा नहीं। फिर टोना आदि में उनके प्रेत पिशाचों में वह शक्ति कहां जो जीवन-मरण के ईश्वरीय अधिकार को स्वयं ग्रहण कर सकें यह और कुछ नहीं तदनुरूप विचारों की ही परिणति होती है। 

🔴 मनुष्य के आन्तरिक विचारों के अनुरूप ही बाह्य परिस्थितियों का निर्माण होता है उदाहरण के लिए किसी व्यापारी को ले लीजिए। यदि वह निर्बल विचारों वाला है और भय तथा आशंका के साथ खरीद फरोख्त करता है, हर समय यही सोचता रहता है कि कहीं घाटा न हो जाय, कहीं माल का भाव न गिर जाय, कोई रद्दी माल आकर न फंस जाय, तो मानो उसे अपने काम में घाटा होगा अथवा उसका दृष्टिकोण इतना दूषित हो जायेगा कि उसे अच्छे माल में भी त्रुटि दीखने लगेगी, ईमानदार आदमी बेईमान लगने लगेंगे और उसी के अनुसार उसका आचरण बन जायेगा जिससे बाजार में उसकी बात उठ जायेगी। उससे सहयोग करना छोड़ देंगे और वह निश्चित रूप से असफल होगा और घाटे का शिकार बनेंगे। अशुभ विचारों से शुभ परिणामों की आशा नहीं की जा सकती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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