शुक्रवार, 17 मार्च 2017

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 23)

🌹 परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान    

🔴 बिजली की शक्ति-सामर्थ्य से सभी परिचित हैं। छोटे-बड़े अनेकों यन्त्र-उपकरण उसी की शक्ति से चलते और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित करते हैं। मनुष्य शरीर में भी जीवनचर्या को सुसञ्चालित रखने में जैव विद्युत ही काम आती है। चेहरे पर चमक, स्फूर्ति और पुरुषार्थ कर दिखाना उसी के अनुदान हैं। मन में शौर्य-पराक्रम साहस-विश्वास आदि के रूप में जब उसका अनुपात संतोषजनक मात्रा में होता है, तो उसे प्रतिभा कहते हैं। वह अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाती है। कठिनाइयों से जूझ पड़ना और उन्हें परास्त कर सकना भी उसी का काम है।                         

🔵 महत्त्वपूर्ण सृजन-प्रयोजनों को कल्पना से आगे बढ़कर योजना तक और योजना को कार्यान्वित करते हुए सफलता की स्थिति तक पहुँचाने की सुनिश्चित क्षमता भी उसी प्रतिभा में है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्राणाग्नि एवं तेजस्वी मानसिकता कहते हैं। उपासना क्षेत्र में इसीलिए प्राणायाम जैसे यत्न सरलतापूर्वक किये जाते हैं। तपश्चर्या में तितीक्षा अपनाते हुए साधन-सुविधा की आवश्यकता इसी अन्त:शक्ति के सहारे सम्पन्न कर ली जाती थी। शाप-वरदान एवं असाधारण स्तर के चमत्कार दिखा सकना और कुछ नहीं मात्र प्राणाग्नि के ज्वलनशील होने से उत्पन्न हुई ऋद्धि-सिद्धि स्तर की क्षमता ही है। 

🔴 शरीरबल, धनबल, बुद्धिबल तो कई लोगों में पाए जाते हैं, पर प्रतिभा के धनी कभी कहीं कठिनाई से ही खोजे-पाए जा सकते हैं। दैत्य दुष्प्रयोजनों में और देव सत्प्रयोजनों में इसी उपलब्ध शक्ति का उपयोग करते हैं। समुद्र-मन्थन जैसे महापराक्रम इसी सामर्थ्य की पृष्ठभूमि से बन पड़े हैं।           
     
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य