शुक्रवार, 17 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 79)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 अगले कदम बढ़ने पर तीसरी मंजिल आती है- आत्मवत सर्व भूतेषु। अपने समान सबको देखना। कहने- सुनने में यह शब्द मामूली से लगते हैं और सामान्यत: नागरिक कर्तव्य का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार    की सीमा तक पहुँच कर बात पूरी हो गई दीखती है, पर वस्तुत: इस तत्त्व ज्ञान की सीमा अति विस्तृत है। उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्म सत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है। साधना के लिए दूसरे के अन्तरंग के साथ अपना अन्तरंग जोड़ना पड़ता है और उसकी सम्वेदनाओं को अपनी सम्वेदना समझना पड़ता है।          

🔵 वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता का यही मूर्त रूप है कि हम हर किसी को अपना मानें, अपने को दूसरों में और दूसरों को अपने में पिरोया हुआ- घुला हुआ अनुभव करें। इस अनुभूति की प्रतिक्रिया यह होती है कि दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दु:ख में अपना दु:ख अनुभव होने लगता है। ऐसा मनुष्य अपने तक सीमित नहीं रह सकता, स्वार्थों की परिधि में आबद्ध रहना उसके लिए कठिन हो जाता है। दूसरों का दु:ख मिटाने और सुख बढ़ाने के प्रयास उसे बिलकुल ऐसे लगते हैं, मानों यह सब अपने यह सब अपने नितान्त व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए किया जा रहा है। 

🔴 संसार में अगणित व्यक्ति पुण्यात्मा और सुखी हैं, सन्मार्ग पर चलते और मानव जीवन को धन्य बनाते हुए अपना व पराया कल्याण करते हैं। यह देख- सोचकर जी को बड़ी सान्त्वना होती है और लगता है सचमुच यह दुनियाँ ईश्वर ने पवित्र उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाई। यहाँ पुण्य और ज्ञान मौजूद है। जिसका सहारा लेकर कोई भी आनन्द- उल्लास की, शांति और सन्तोष की दिव्य उपलब्धियाँ समुचित मात्रा में प्राप्त कर सकता है। पुण्यात्मा, परोपकारी और आत्मावलम्बी व्यक्तियों का अभाव यहाँ नहीं है। वे संख्या में कम भले ही हों अपना प्रकाश तो फैलाते ही हैं और उसे चाहे थोड़े से प्रयत्न से सजीव एवं सक्रिय कर सकता है। धरती वीर विहीन नहीं, यहाँ नर- नारायण का अस्तित्व विद्यमान है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य