शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

👉 सबसे बड़ी पराजय का दिन

🔴 पेरिस संसार का सबसे खूबसूरत शहर माना जाता हैं-सौंदर्य या नग्न संस्कृति के लिए। और कुछ तो हम नहीं कह सकते, पर जिस दिन हम उस शहर की धरती पर उतरे थे, उससे मोहित हुए बिना न रह सके। जी भरकर उसे देखा। एक ही स्थान को कई बार देखा फिर भी आकर्षण कम न हुआ। हमारे अमेरिकन मित्र-टामसन रिचे जिनके साथ हम विशेष अध्ययन के लिए मिशगन जाते हुए यहाँ ठहरे थे, हमारे साथ ही थे। उन्होंने ही सारा शहर भली भॉति घुमाया। अंत मे उनका आभार मानते हुए कहना ही पडा-'मित्र! आखिर आपकी कृपा से विश्व के इस अद्वितीय सौंदय को समीप से देखने का सौभाग्य सफल हो गया।''

🔵 आशा की थी कि इस आभार-प्रदर्शन से मित्र महोदय प्रसन्न होंगे। हम इतने आदर्शवादी हो गये हैं कि बात-बात में प्रशंसा करने लगते हैं, इससे हमें झूठा आत्म-सतोष तो संभव है मिल जाए, पर अति आदर्शवाद का अर्थ है यथार्थता से विमुख होना। संसार में अनेक प्रकार की सुंदर से सुंदर वस्तुऐं है, पर हम किसी एक सौंदर्य पर ही इतना आसक्त हो जाते हैं कि सृष्टि की अन्य सुंदरताओं की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हम समझते हैं आज का सपूर्ण भौतिकवादी समाज ज्ञान की इस संकीर्ण कोठरी मे बंद है। परमात्मा की सृष्टि कितनी विशाल! कितनी शोभायुक्त और दर्शनीय!!। उसका अवलोकन करने के लिए जिस बंधनमुक्त आत्मा की जरूरत है, उधर हमारा ध्यान ही नहीं जाता, क्योंकि हम आसक्त हैं, भौतिकता की चमक से चकाचौंध है।

🔴 हुआ प्रत्याशा से विरुद्ध। मित्र महोदय ने एक व्यंग भरी मुस्कान छोडते हुए कहा-''अनिल! काश तुम्हारे शब्दों का समर्थन कर पाता तो बडी प्रसन्नता होती, पर यह कहते हुए बडा दुख होता है जिन भारतीयों ने विश्व को अध्यात्म ज्ञान की गंगा से नहला कर स्वच्छ किया वही पाश्चात्य-दर्शन के गुण गाते हैं। वेद, गीता, रामायण, महाभारत का नाम भी अच्छी प्रकार नहीं जानते पर पैराडाइस लास्ट, हैमलेट या जूलियस सीजर पर अनेकों थीसिस लिख सकते हैं। भारतीय संगीत, कला की गंभीरता को भूलकर, पश्चिम की कला के पैर पूजते है। हिंदू होकर हिंदी नहीं जानते और अंग्रेजी का कोई क्षेत्र नहीं छोड़ते। भारतीयों को अपनी इस पराधीन स्थिति पर भले ही संकोच न होता हो, पर हम दुःख से नत हो जाते हैं कि यथार्थवादी सत्य-शिव-सुंदर का प्रतिपालक भारतीय तत्त्व-ज्ञान ही नष्ट हो गया तो इस विश्व का क्या होगा ?"

🔵 टामसन साहब उस समय साक्षात रुद्र की भाँति लग रहे थे। साँस लेकर पुन: बोले- 'मेरा मतव्य यही है कि सब अच्छी वस्तुएँ भारतवर्ष में ही है, वरन् जो विश्व में है वह भारत में अवश्य है। मैं १० वर्ष भारत में गाँव-गाँव घूमा हूँ। हिमालय का सा सौंदर्य इस तुच्छ पेरिस में कहाँ है। गंगोत्री, अमरनाथ, दार्जिलिंग, वृंदावन, मीनाक्षी, श्रीरंगपट्टम जैसा प्राकृतिक और आध्यात्मिक सौंदर्य दुनिया में कहाँ मिलेगा ? संस्कृत-सी देवभाषा की समता नादान अंग्रेजी कर सके, इतनी प्रौढ़ता उसमें कहाँ, मेरे मित्र! मुझे दुःख है कि आप श्रेष्ठता ढू़ँढने अमेरिका और पेरिस दौड़े आते हैं, धन्य है आपकी स्वतंत्रता और विचार-साधीनता!

🔴 सचमुच मेरी हिम्मत न हुई कि मैं टामसन रिचे के आगे मुँह उठा सकूँ लज्जा से धरती में गड़ा जा रहा था। भारतीय होकर भी अपनी अभारतीयता की स्थिति पर तब इतना क्षोभ हुआ, शायद उतना अपनी माँ की मृत्यु पर भी न हुआ हो। वास्तव मे वह मेरी सबसे बड़ी पराजय थी। उस दिन से मुझे भारतीय वेशभूषा पसंद है। वेद, गीता, रामायण आदि का स्वाध्याय कर लेता हूँ। इनमे जो भावनात्मक आनंद आता है, वह अंग्रेजी-उपन्यासों मैं कदापि नहीं मिला। अब विदेश घूमने की इच्छा कभी नहीं होती, वहाँ जाकर अपना आत्माभिमान क्यों बेचें ?

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