शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 40)

🌞 हिमालय में प्रवेश (गोमुख के दर्शन)

🔵 सोचता हूं कि यहां गोमुख में गंगा एक नन्हीं सी पतली धारा मात्र है। रास्ते में हजारों झरने, नाले और नदी उससे मिलते गये हैं। उनमें से कई तो इस गंगा की मूल धारा से कइयों गुने अधिक बड़े हैं। उन सबके संयोग से ही गंगा इतनी बड़ी और चौड़ी हुई है, जितनी हरिद्वार, कानपुर, प्रयाग आदि में दिखाई पड़ती है। उसमें से बड़ी-बड़ी नहरें निकाली गई हैं। गोमुख के उद्गम का पानी तो उनमें से एक नहर के लिए भी पर्याप्त नहीं हो सकता। यदि कोई नदी-नाले रास्ते में उसे न मिले तो सम्भवतः सौ पचास मील की मिट्टी ही उसे सोखले और आगे बढ़ने का अवसर ही न रहे। गंगा महान् है—अवश्य ही महान् है। क्योंकि वह नदी-नाले को अपने स्नेह बन्धन से बांध सकने में समर्थ हुई। उसने अपनी उदारता का अंचल फैलाया और छोटे-छोटे झरनों नालों को भी अपने बाहुपाश से आबद्ध करके छाती से चिपटाती चली गई। उसने गुण-दोषों की परवा किये बिना सभी को अपने उदर अंचल में स्थान दिया।

🔴 जिसके अन्तर में आत्मीयता की, स्नेह सौजन्य की अगाध मात्रा भरी पड़ी है उसे जल राशि की कमी कैसे पड़ सकती है। दीपक जब स्वयं जलता तो पतंगे भी उस पर जलने को तैयार हो जाते हैं। गंगा जब परमार्थ के उद्देश्य से संसार में शीतलता फैलाने निकली है तो क्यों न नदी नाले भी उसकी आत्मा में अपनी आत्मा की आहुति देंगे? गांधी, बुद्ध, ईसा की गंगाओं में कितनी आत्माएं आज अपने को आत्म सात करा चुकी हैं, यही सभी को स्पष्ट दृष्टि गोचर हो रहा है।

🔵 गंगा की सतह सबसे नीची है, इसलिए नदी नालों का गिर सकना सम्भव हुआ। यदि उसने अपने को नीचा न बनाया होता, सबसे ऊपर उठकर चली, अपना स्तर ऊंचा रखती, तो फिर नदी नाले तुच्छ होते हुए भी उसके अहंकार को सहन न करते, उससे ईर्ष्या करते और अपना मुख दूसरी ओर मोड़ लेते। नदी नालों की उदारता है सही—उनका त्याग प्रशंसनीय है सही—पर उन्हें उस उदारता और त्याग को चरितार्थ करने का अवसर गंगा ने अपने को नम्र बनाकर, नीचे स्तर पर रखकर ही दिया है। अन्य अनेकों महत्ताएं गंगा की हैं पर यह एक महत्ता ही उसकी इतनी बड़ी है कि जितना भी अभिवादन किया जाय कम है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...