सोमवार, 30 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 91)

🌹 आदर्श विवाहों का प्रचलन कैसे हो?

🔴 आदर्श विवाहों का प्रचलन हिन्दू समाज की आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसे युग की महत्वपूर्ण मांग कहना चाहिए। नव-निर्माण के लिए कुप्रथाओं को हटाकर उनके स्थान पर स्वस्थ परम्पराओं को जन्म दिया जाना आवश्यक है। ऐसे प्रयत्नों से ही सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य पूर्ण होगा।

🔵 आदर्श विवाहों की 24 सूत्री रूपरेखा मूर्त रूप कैसे धारण करे इसके लिए नीचे आठ उपाय प्रस्तुत किये जा रहे हैं। इनको अपनाने से ही यह महान विचारधारा कार्यान्वित हो सकेगी।

🔴 (1) समान विचार वालों की तलाश— आदर्श विवाह तभी संभव, सफल और सार्थक हो सकते हैं जब दोनों पक्ष समान विचार के हों। एक पक्ष आदर्शवादी हो और दूसरा रूढ़िवादी तो ‘आधा तीतर आधा बटेर’ कहावत के अनुसार वह विवाह भी आधा सुधरा, आधा प्रतिक्रियावादी रहेगा। कभी-कभी तो यह मतभेद उग्र होकर संघर्ष और द्वेष का रूप भी धारण कर लेता है। जो बेमन से ठोक-पीटकर आदर्शवादी बनते हैं वे गुप्त रूप से दहेज आदि मांगते हैं और इच्छानुसार न मिलने पर किसी अन्य बहाने अपना रोष प्रकट करते हैं।

🔵 आवश्यकता इस बात की है कि दोनों ही पक्ष आदर्शवादी विचारों के मिलें। यह खोज काफी कठिन होती है। धन, शिक्षा, स्वास्थ्य की दृष्टि से तो अच्छे लड़के मिल जाते हैं पर विचारों के साथ ताल-मेल न बैठने से उनको नीलामी बोली पर ही खरीदना संभव होता है। अस्तु हमें वह माध्यम ढूंढ़ निकालना पड़ेगा जिसके अनुसार परस्पर विवाह संबंध करने वाली इकाइयों में जो भी प्रगतिशील विचारों के हों वे एक संगठन सूत्र में बंधे हों और उनका परस्पर परिचय सुलभ हो सके। इस वर्ग में से अपनी-अपनी स्थिति के अनुकूल जोड़े ढूंढ़ लिये जाया करें, तब आदर्श विवाहों की परम्परा सरल हो जायगी।

🔴 कई जातीय पत्रों में वर कन्या का परिचय, विवरण छपता रहता है, उससे कुछ विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। ऐसी जानकारी तो किसी भी कालेज में जाकर आसानी से प्राप्त की जा सकती है। जब तक लड़का और उसके घर वाले आदर्श रीति से विवाह करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध न हों, तब तक लड़कों की सूची छपना कुछ महत्व नहीं रखता। हमें उन जातीय इकाइयों को संघबद्ध करना पड़ेगा जो परस्पर विवाह शादी करती हैं। इसके लिए दो उपाय हो सकते हैं (1) प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन। (2) उन संगठनों द्वारा आयोजित वार्षिकोत्सव या जातीय मेले। दोनों की रूपरेखा आगे प्रस्तुत की जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 अपना मूल्य, आप ही न गिरायें (भाग 2)

🔵 आत्म-अवमूल्यन आत्म-हत्या जैसी किया है। जो लोग आवश्यकता से अधिक दीन-हीन, क्षुद्र और नगण्य बन कर समाज में अपनी विनम्रता और शिष्टता की छ...