सोमवार, 30 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 40) 31 Jan

🌹 साधना की पूर्णाहुति

🔴 गायत्री और यज्ञ का अनिवार्य सम्बन्ध है। यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है। गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है तो यज्ञ को संस्कृति का पिता। भारतीय धर्मानुयायियों के जीवन में यज्ञ का बड़ा महत्व है। कोई भी कार्यक्रम बिना यज्ञ के पूरा नहीं होता। साधनाओं में तो हवन और भी अनिवार्य है। जितने भी पाठ, पुरश्चरण, जप, साधन किये जाते हैं वे चाहे वेदोक्त हों चाहे तांत्रिक उनमें किसी न किसी रूप में यज्ञ, हवन अवश्य करना पड़ता है। प्रत्येक कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, पर्व, त्यौहार, उत्सव, उद्यापन सभी में यज्ञ अवश्य करना पड़ता है।

🔵 इस प्रकार गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण में जप से दसवां भाग हवन करने का विधान है। यदि इतना न बन पड़े तो शतांश [सौवां भाग] हवन करना चाहिए। गायत्री उपासना के साथ यज्ञ का युग्म बनता है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। इन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है, जिसे द्विजत्व कहते हैं। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म। जैसे अपने शरीर को जन्म देने वाले माता, पिता की सेवा पूजा करना मनुष्य का कर्तव्य है, उसी प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता की पूजा भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्तव्य है।

🔴 यह नहीं सोचना चाहिए कि सामान्य और नियमित उपासना क्रम में यज्ञ की कोई आवश्यकता नहीं है। यज्ञ को प्रत्येक व्यक्ति का आवश्यक नित्य कर्म माना गया है। यह बात अलग है कि लोग उसका महत्व एवं विधान भूल गये हैं और केवल चिन्ह पूजा करके काम चला लेते हैं। घरों में स्त्रियां किसी रूप में यज्ञ की चिन्ह पूजा करती हैं। त्यौहारों या पर्वों पर अग्नि को जिमाने या अज्ञारी करने का कृत्य प्रचलित है। थोड़ी-सी अग्नि को लेकर, घी डालकर उसे प्रज्वलित करना और उस पर पकवान के छोटे-छोटे ग्रास चढ़ाना तथा फिर अग्नि से जल की परिक्रमा करा देना, यही प्रक्रिया प्रत्येक घर में पर्व एवं त्यौहारों पर सम्पन्न होते देखी जा सकती है। शास्त्रों में बलिवैश्व का नित्य विधान है। प्रतिदिन भोजन बनने के बाद बलिवैश्व के लिए अग्नि में आहुति देनी होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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